श्रद्धा, ज्ञान और चरित्र | Shradha Gyan Aur Charitra

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Shradha Gyan Aur Charitra by चम्पतराय जैन - Champataray Jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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€ श्रद्धा, चान श्चार चरित घटना का वर्णन्‌ किसी भूठ या भपिष्यत्त घटना के? नुसार करना, जैसे यह कहना! कि “छाज अतिम तीर्थक्षर महावीरजी का निर्वाण-दिवस है (फ्न्‍्तु वस्तुत महायीरजी ने श्राज से २५००० वपं म श्चधिक पहल निर्माण प्राप्त किया था () (२ एक जाति या वर्ग या श्रेखी के भाय मे, जैंस कहना “झात्मा परमात्मा रूप है यहाँ सारी श्रेणी का उल्लेस हुछा है, न कि किसी खास व्यक्ति का ! (३ किसी एक सास व्यक्ति थी श्पेक्षा, जैसे “रामप्रसाद बहुत होशियार है | (४) एक पतार्थ के पर्याय की छपेक्षा से-द्रव्य की '्पेक्षा को छोडकर । जैसे श्वर नट करनियः गया है-इम वाम्य में यह स्पष्ट है कि घर चौ सामग्री (४८2) नष नहीं वी गई है--क्यल उसरी पर्याय नष हो गयी है (५0) व्याकरण के भाव मे-जहाँ व्याकरण ओर कोप के नियमा के श्चनुसार शब्दों क भाय लगाया जाय। उदाहरण के रूप में यह्‌ वाम्य लीजिय कि “सूरज पूर्व म उगता है ' इस में “सूरज” साधारण भाव में उयवहृत डुआ है । (६ अलक्चर या सास भाव में जैसे--कि 'सुर्य देवताओं में श्रमणी है । यहाँ 'सूय केवल ज्ञान का चिन्ह है शौर 'देवता” एक झुद्धात्मा के श्यात्मिक गुणों के द्योततक हैं ।




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