जैन साहित्य में विकार | Jain Sahitya Me Vikar

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Jain Sahitya Me Vikar by तिलक विजय पंजाबी - Tilak Vijay Punjabiप्रबोध बेचरदास पंडित - Prabodh Bechardas Pandit

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प्रबोध बेचरदास पंडित - Prabodh Bechardas Pandit

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ९३ ) न्तचाद की पचित्नर सरिता में धोने के छिये करिवद्ध हो जाना चादिये । व्यवहार कुशल व्यापारनिपुण जेनसमाजकों भविष्य मे श्रनेवाङी ्रापत्तियोके प्रतिकारका श्रभीमे उपाय करना चाहिये | प्रतिचप लाखों रुपया धार्मिक मुकदमे वाज़ी में-व्यय करने वादी मन्दिरोकी दीवारों पर मनो सोना लिपवाने धारी. लाखों रुपया रथयात्रामें वद्दानेवाछी श्नौर अरसंख्यधन सुनिते- शियोकिं लिये लुखा देने वाटी जेनसलमाज 'कवाल' कः दस शेरको विचार पूर्वक पढ़ें झौर समझे । श्मगरे ्रवभी न खमे तोमिर जाश्चोगे दुनियासे । तम्दारी दास्तां तक भीं न होगी दास्तानोंमें ॥ हिन्दी सापा भाषियों को ऐसी श्रचुपम पुस्तक पढ़नेका सौभाग्य प्राप्त होगा, इसके लिये झनुवादक मददोदय 'घन्यवाद के पात्र हैं । पहाड़ीं-धीरज, दिल्‍ली |.) ज्येप्ठ कृप्णा 2 बी० नि० सं० २छ्४त | अयोध्याप्रसाद गोयलीय “दास” १. पक्लवरभ्ता न मे वीरे, न द्वेषः कपिल्लादिषु। यु क्तिमहचनम्‌ यस्य, तस्यक्ार्रः परिग्रहः ॥ ॥ -धीदरिमदघुरि।




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