ज्ञानार्णवस्य | Gyanarnava

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Gyanarnava by आचार्य शुभचन्द्र - Aacharya Shubhachandra

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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र्‌ ४ सप्तभंगीतरंगिणी भा. टी, यह न्यायका अपूर्व अन्य है इसमें अंथकर्ता श्रीविम- लदासजीने स्थादखि, स्वाज्नास्ति आदि सप्तभंगी नयका विवेचन नव्यन्यायकी रीतिसे किया है । खाद्वादमत कया है यह जाननेकेलिये यह अंथ अवश्य पढना चाहिये | न्‍्यों. १ रु. ५ बृहद्रव्यसंग्रह संस्कृत मा. दी. श्रीनेमिचन्द्रवामीकृत मूल और श्रीव्रह्मदेवजीकृत संस्कृतटीका तथा उसपर उत्तम बनाई गई भाषाटीका सहित है इसमें छह द्वव्योंका खरूप अतिस्पष्टरीतिसे दिखाया गया है । न्‍यों. २ रु. ६ द्रव्यानुयोगतकेणा इस अँथमें शाख्रकार श्रीमद्ोजसागरजीने सुगमतासे मन्दबु- ड्विजीवोंको द्व्यज्ञान होनेकेलिये (अथ, “'गुणपर्ययवद्धव्यम!” इस महाशासत्र तत्त्वाथैसूत्र- के अनुकूल द्व्य--गरुण तथा अन्य पदार्थोका भी विशेष वर्णन किया है और प्रसंगवश 'थादस्तिः आदि सप्तमंगोंका और दिगंवराचायवर्य श्रीदेवसेनलामीविरचित नयचक्रके आधारसे नय, उपनय तथा मूलनयोंका भी विस्तारसे वर्णन किया है। न्‍यों. २ रु. ७ समाष्यतत्वाथोधिगमसत्रम इसका दूसरा नाम तत्वाथीधिगम मोक्षशालर भी है जैनियोंका यह परममान्य और मुख्य अन्य है इसमें जैनधर्मके संपूर्णसिद्धान्त आचार्यवर्य श्रीउठमाखाति (मी ) जीने वड़े लांघवसे संग्रह किये हैं | ऐसा कोई भी जैनसिद्धान्त नहीं है जो इसके सूत्रोंमें गार्भत न हो । सिद्धान्तसागरको एक अत्यन्त छोटेसे तत्त्वार्थरूपी घटमें भरदेना यह काये अनुपमसामथ्थेवाले इसके रचयिताका ही था । तच्वार्थके छोटे २ सूत्रोंके अर्थगांभीर्यको देखकर विद्वानोंको विस्तित होना पडता है। न्‍यों. २ रु. ८ याद्वाद्मजरी संस्क्र. भा. टी. इसमें छहों मरतोंका विवेचनकरके टीकाकतो विद्वद्नये श्रीमछ्िषेणसूरीजीने स्वाद्गादको पूर्णझूपसे सिद्ध किया है । न्‍यों. ४ रु- ९ गोस्मटसार ( कर्मकाण्ड ) संस्क्ृतछाया ओर संक्षिप्त भाषाटीका सहित यह महान्‌ ग्रन्थ श्रीनेमिचन्द्राचायेसिद्धान्तचक्रवर्तीका बनाया हुआ है, इसमें जैनतत्त्वोंका खरूप कहते हुए जीव तथा कर्मका खरूप इतना विस्तारसे है कि वचनद्वारा प्रशंसा नहीं होसकती देखनेसे ही माछ्म होसकता है, ओर जो कुछ संसारका झगड़ा है. वह इन्हीं दोनों ( जीव-कर्म ) के संबन्धसे है सो इन दोनोंका खरूप दिखानेकेलिये अपूर्व तय है । न्यों. २ रु. । इसका दूसरा पूर्वमाग ( जीवकाण्ड ) भी शीघ्र ही मुद्रित होनेवाल है ॥ १० प्रवचनसार--अश्रीअम्ृतचन्द्रसूरिकृत तत्त्पप्रदीपिका सं. टी., “जो कि यूनिवर्सिटीके कोर्समें दाखिल है” तथा श्रीजयसेनाचायेक्ृत तात्ययेबृत्ति सं. टी. और वालबबोधिनी भाषादीका इन तीन टीकाओंसहित जो कि आपकी समक्ष उपखित है इसके मूलकती श्री- कुन्दकुन्दाचार्य हैं | यह अध्यात्मिक ग्रन्थ है.। न्‍यों. ३ रु. प्रन्थोंके मिलनेका पत्ता- डे ह सम कक ८ शा. रेचाशंकर जगजीवन जोंहरी- ऑनरेरी व्यवस्थापक श्र जोहरीवाजार खारा कुवा वम्बई ने. २।'




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