ओंकार उपासना | Onkar Upasana

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Onkar Upasana by स्वामी सत्यानन्द जी महाराज - Swami Satyanand Ji Maharaj

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ऑओकार उपासना । १५ बिना बोले नहीं जाते, अतएव वे अपूर्णे ओर अधूरे है । अवण का उच्चारण सन वणोके उच्वारणमे रमा इआ है, यहां तका कि शब्दमात्रे अवर्णकी वियमानता है, इसटिए्‌ अवणै सब वर्णो और सब दाब्दोंगें व्यापक है । व्यापक वस्तु ही महान होती है| अतएव अवर्णं पूणं व्यापक, ओर महान है । अध्यात्म वादमे अ से ओम्‌ बनता है 1 नसे वणैमाखमें अवण पूणे वर्ण है, अन्य सरि वर्णौमि व्यापक है, ओरं अन्य सव वर्णेति महान है, ऐसे ही ओम स्वरूपम पूर्णं है । किसी मी पदार्थकी अपेक्षा नदीं रखता । अन्य सरे पदायै ओमूके अश्रित हैं । वर्णोंमें अवर्णवत्‌ आम्‌ सव पदा्थमे व्यापक दै । सक्ते महान ह । जो वस्तु पूण ओर महान हो, वही आनन्दमय हो सकती है, अत एव ओम्‌ आनन्द स्वरूप है । पूर्णानन्दमय ही परम प्रिय स्वरूप हो सकता है, इस लिये भक्त छोग भगवान्‌को परम प्रिय स्वरूप भी कहते हैं । ऊपर के “ओम के सारे व्याख्यानका सारांश स्वल्प ओर शास्त्रीय कदो कहा जाय तो ओमूका अथै, सच्चिदानन्द) अथवा असिति, माति, प्रिय स्वरूप परमेश्वर है । ओम्‌ भगवान्‌ अनन्त जीवन, अनन्त ज्ञान, ओर परम प्रेम स्वरूप है । 'अम्‌ › निराकार है । ओम्‌ अक्षरकी आकृति कल्पित है । वह॒ परिषरतित हो सकती है, ओर होती आ है । इस समय भी ओम्‌ अनेक आकृतियोंमें लिखा जाता है। मिन्न २ माषाओोंमें भी उसके मिल २ आकार हैं । परन्तु 'ओमस' का उचारण 'ओसः की ध्वनि ~




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