बिहार का साहित्य पार्ट - १ | Bihar Ka Sahitya (part-i)

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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श्रा. स्वागनकनरिष्णी मसिति के साननीय अध्यक्ष, उपस्थित भाइयों और बहनो-- आज मंगछसंय सुहत है--सुग्बमय शुम समय है-जानन्देमय ऊष्िनीय अवसर है । श्माज हम रोग शुचि शाख्ासी नदी के तर पर, पविन्न हरिहर फ्त्र में, वीशापाणि भगवती भारती की भक्ति प्रथ्चंक भाराघना करने के लिये, बहुत दियों के बाद, एकन हुए है । चीणापाणि की उपासना से बड़फर और कोई उपासना नहीं है। इससे अर्थ, धर्म्म, काम, सोश्च सज कुर सज ही पाठ हो जते है । म्रदा प्रैवी की कृपा से मनुष्य अमर होता है। आज हम भी सर्व प्राप्ति की आकांक्षा से यहां जाये हैं । आशा है. साना की असुकम्पा ये अवशय ही अमर हो जायेंगे । माता के मन्दिर में सेदभाव नहीं हे और न पक्षपात हैं। वहां राजा-रंक. घनी-दरिक सबको समान झधिकार झौर समान स्वतन्त्रता है । सरस्वती की सेवा पर सबका ही. समान स्वत्व हे । इखीने भाज बिहार ऊ छोटे-बड़े, वारक द, स्त्रीपुरुष, अभीर - गरीब, हिन्द-सुसलमान जातिसेद, वर्णसेद, स्यक्तिमंद भूठकर जराज्जननी के श्नीचरणों में पुप्पाजलि प्रदान करने को प्रस्तुत हैं। सबका ही एक उद्देश्य ओर एक लक्षय है-सबका हां एक सन भार एक माण है--सबका ही पक झान और एक ध्यान ह-सबका ही णक स्वर सौर ण्क लान हे--सबही अपनी अपनी सामथ्य के अनुसार साता की पुजा करने के लिये उत्तावले हो रहे है । भाइयों, जाज बहुत दिनो परे साता की याद आयी है । हम |




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