जैनेन्द्र सिद्धान्त कोश भाग - 4 | Jainendra Siddhant Kosh Part - 4

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
31.76 MB
कुल पष्ठ :
553
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)शरोरहोना संसारके दु.स्वॉका मूल कारण है । इसलिए दारोरमें आत्मत्वकों
छोड़कर बाद इन्द्रिय विषयॉसि प्रबत्तिको रोकता हुआ आत्मा अन्त-
रंगे ब्रबेदा करे 1९)था अनु, १६१४ आदोौ तनोज॑ननमत्र हतेन्दियाणि काउसन्ति तामि बिष-
याव बिषयाश्च सानहानिप्रयासभयपापकुपो निंदा स्यु-म्रल ततस्त-
मुरवर्थ पर पराणासु ।१६४। <प्रारम्भमें दारीर उसपर होता है, इससे
बुह इन्द्रियाँ होती हैं, वे अपने-अपने विषयोक्ों चाहती हैं। और
बे विषय मानहानि, परिश्रम, भय, पाप एवं दुर्गतिकों देनेबाले हैं ।
इस प्रकारसे समस्त अनथों की मूल परम्पराका कारण दारीर है 1९६४1ज्ञा २६१०-११ हारीरमेतदादाय त्वया दु व्व विसहाते । जन्मन्यर्स्मिस्त-
तस्तद्वि नि ददोषानथमन्दिसमु ।1१०। भवोद्धबानि दुखानि यानि
मानीह देहिभि । सहान्ते तामि तान्युच्चे पुराद।य केबल मू 1११ ०० है
झ्ात्मन ' तूने इस संसारमें दारीरको यहण' करके दु ख पाये वा सहे
हैं, इसीसे तू निरचय जान कि यह शरीर ही समस्त अनथॉँका घर
है, इसके ससरगसे सुखका लेदा भी नहीं मान ।१०। इस जगत में
संसारसे उत्पन्न जो-जों दुख जीबॉको सहने पड़ते है वे सब इस
शरीरके प्रहणसे ही सहमे पढ़ते हैं, इस दारोरसे निवृत्त होनेपर कोई
भी दुख नहीं है 1११:श. झरीर बास्तबमं जपकारी हैइ उ./१६ यज्जोवस्योपकाराय तहदेहर्यापकारक । यह देहस्योपकाराय
तज्जीबर्यापकारक 1१६। नजो अनशनादि तप जोधबका उपकारक है
बहु दारोरका अपकारक है, और जो धन बस्त्र, भोजनादि दारीर का
उपकारक है बह जीवका अपकारक है । ९1खस, धर योगाय कायमसुपालनयतोी इषि युक्स्या, बलेश्यो ममत्व
हतमें तब सोधधपि दाबत्या । भिक्षोडन्यथ।ह-सुखजी बिहरन्धल!म/त्,
तृष्णा सरिद्रिधरयिष्यति संसपोदिस 1१४१1. ० योंग-ररसब्रयात्सक
घर्मकी सिंद्धिके लिए सममके पालनमें विरोध न आवे इस ततरहसे
रपा करते हुए भी शक्ति और युक्तिके साथ दारीरमें लगे ममत्बकों दूर
करमा चाहिए । क्योंकि जिस प्रकार साधारण भी मदी जरासे भी
छिडकों पाकर दुर्भेदा भी पर्वतमें प्रबेशकर जज रित कर देती है उसी
प्रकार तुल्छ तृष्णा भो समी चौन तर रूप पर्वतकों छिनन-भिननकर
जर्जरित कर हालेगी 1१४१है, घमर्थीकि किए दारीर उपकारी हेज्ञा. २/६/१ तैरेब फलमेतस्प गृहीत पृण्यकर्मभि । बिरज्य जन्मन'
स्वार्थे थे दारीर कदथितस् ।£। “इस दारोरके प्राप्त होनेका फल
उन्होंने लिया है, जिन्होंने संसारसे बिरक्त हॉकर, इसे अपने कल्याण
मार्ग में प्ृरण्पक्मोसि क्षीण किया 171अन, थ /४/१४० शरीर' धर्म संयुक्त रूतितव्यं प्रयरमत । इत्याप्रभाच-
स्त्वग्देहस्त्याज्य एबेति तण्यूल ।१४०।. *'घ्मके साधन दारीरकी
प्रयत्न पूर्वक रक्षा करनी चाहिए', इस डदिक्ाकों प्रबचनका तुष सम-
मकमा चाहिए। 'आस्मसिद्धिके लिए दारोररक्षाका प्रयत्न सर्व थां
निरुपयोगी है ।* इस दिश्ाकों प्रवचन का तण्डूल समफकना चाहिए ।अन घ /७/४ शरीमाद्य किल घर्ससाधनं, तदस्य यस्पेद् स्थितये5झा-
नादिना । तथा यधाक्षाणि बच्चे स्युरुसपथं, न बानुघानन्त्यतुनद्धतृड-
बढ़ाव् ।£। >रत्नहूप धर्मका साधन दारीर है अत शयन, भोजनपान
आदिके द्वारा इसके स्थिर रखनेका प्रयतन करना 'बाहिए । किस्तु हस
नातकों सदा ल्यमें रखना चाहिए कि भोजनादिकर्में प्रमृत्ति ऐसी
और उतनी हो जिससे इन्दियाँ अपने अधीन रहें। ऐसा न हो कि
कि गग बासनाके वशवर्ती होकर उस्मार्गको तरफ दौड़ने
लगें ।६1शलाका पुरुष४. दारीर ग्रहणका प्रयोजनआ अनु. ७० अवश्य नश्बरे रेभिरामु कायादिधियंदि । शाश्बत पद-
मायाति मुधायात्तमवै हि ते 5० “इसलिए यदि अवश्य नह होने-
बाले इन आयु और दारीरादिकोंके द्वारा तुमे अधिनश्वर पद प्राप्त
होता है तो तू उसे अनायास हो आमां समक|[७ ।७. झरदीर बन्घ बतानेका प्रयोजनप का /ता बू.रि/७३/१० अत्र य एव देहाद्विस्नो5नस्तक्वानादिगुण:
शुद्धा्मा भणित' स एवं शुभाशुभसंक्पथिकश्पपरिहारकाते सर्बश्र
प्रकारेणो पादेयों भेबती त्यभिप्राय, । यहाँ जो यह दे हसे भिस्न अनन्त
ज्ञानादि गु्णोंसे सम्पन्न शुद्धारमा कहा गया है, यह आत्मा ही शुभ म
अशुभ सकल्प विकक्पके परिहारके समय सर्वप्रकारसे उपादेय होता
है, ऐसा अभिप्राय है ।द्, से (टी /१०/२०/७ इदमत्र तात्पर्यम-वेहममत्वनिमिसम देह गृहीरबा
ससारे परिश्रसति तेन कारणेन देहादिममत्य रयकरबा निर्मोहमिज-
झुद्धात्मनि भावना कतव्येति। >तारपर्य यह है-जीब देहके साथ
ममत्वके निमित्तसे देहक। फहणकर ससरमें भ्रमण करता है, इसलिए
देह आदिके ममस्वको छोड़कर निर्मोह अपने शुद्धात्मामें भावना
करनी चाहिए 1हारोर पर्याप्ि--वं पर्याप्ि।
दरीर पर्यौाप्ि काल--द काल/१।
शरोर मद--दे मद ।हारोर मिध काल--दे, काल/१।शकराप्रभा--+, स सि /३/१/२०१/८ दार्क राप्रभासहचरिता श्र मिः
हार्कराप्रभा। एसा सज्ञा अनेनोपायिन व्युर्पादन्ते । “जिसकी
प्रभा झरकराके समन है बह काकराप्रभा है। इस प्रकार नामके अमु-
सार ब्पूस्पति कर लेनी बाहिए। ( हि, प (२९१), (रा बा, डिश
र९१५), (ज प॥/११/१९१) 1२, शरकरप्रभा पूथिवोका लॉक
में अवस्थान | दे नरक/४/१९,३ दार्कराप्रभा पृथिबीका नकदा ।
दे. लोक/ २५ ।दाक रावती--भरत सेवस्थ आर्य खण्डकी एक नदी-दे मसुष्य/४ ।
शलाका--जो बिवशपित भाग करनेके अर्थ कलह प्रमाण ककपना
कौजिये ताका नाम यही शलाका जानना । बिक्षेष- दे गणित/1/२दलाका पुद्ष---तोथकर चक्रचर्ती आदि प्रसिद्ध पुरुषोंको दालाका
पुरुष कहते हैं । प्रत्येक कश्पकालमें ६३ होते हैं। २४ तीर्थ कर, १२
'चक्रबती, £ बलबेव, £ नारायण, £ प्रतिनारायण । अथवा £ नारद,
हर रुद २४ कामदेव, व १६ कुलकर आदि मिलानेसे १६६ दालाका
पुरुष होते है ।| पा१ | झलाका पुरुष सामान्य निर्देश
१ | ६४ शलाका पुरुष नाम निर्देश ।२. | १६९ शलाका पुरुष निर्देदा ।ज दालाका पुरुषोकी आयु बन्व योग्य परिणाम ।|
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# | कौन पुरुष मरकर कहाँ उत्पन्न हो और क्या गुण
।“दे, आयु ।
प्राप्त करें 1 --वे, ज्न्म/ह ।
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