हमारी नाट्य परम्परा | Hamari Natya Parampara

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Hamari Natya Parampara by श्री कृष्णदास जी - Shree Krishndas Jee

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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श्ट | विरोध में शचन्द्र-खमाः लिखी । साथ ही रंगम॑च पर खेलने योग्य नाटक भी लिखते रहे। यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि भारतेन्दु के पहले भी नाठकों की रचना होती थी | महाराज यश- नन्त सिह (१६२६-७८) ने 'प्रबोध-चन्द्रोदय” का अनुवाद १६४३ ६० में किया था। उनके बाद मुंशी कनवासी दास ने भी इसका अनुवाद किया । यह अनुवाद फारसी में था और इसका नाम 'गुलजारेहाल? था। नेवाज ने शकुन्तला का अनुवाद १६८० ई० में किया था और रघुराम नागर ने खमासारः नारक की रचना १७०७ ई०» में की थी | बनारसीदास जैनने मी '्वमयसारः नाठक की रचना अकबर के शासन काल के अन्त में की थी। रीवा नरेश महाराज विश्वनाथ सिंह ( १६६१-४७ ) ने आननन्‍्द-रघुनन्दन” और “गीता-रघुनन्दनः नास्को की रचना की | श्रीमती डा० शारदा देवी वेदालङ्कार ने मुभे एक पत्म बताया है कि उन्हे “श्रीकृष्ण चरित्ोपाख्यानः नामका एक नाटक लन्दन लाइब्रेरी में मिला था जिसकी माइक्रोफिल्म प्रति उनके पास मोजूद है। यह नाटक काठमारडू मे १ सितम्बर १८३५ से प्रायः ८ दिनों तक खेला गया था | सन्‌ १८४१ में भारतेन्दु बाबू हरिश्रन्द्र के पिता श्री गोपाल चन्द्र ने 'नहुषः नाटक लिखा । १८६२ ই০ में राजा लक्ष्मण सिह ने अभिज्ञान-शाकुन्तल का अनुवाद शुद्ध खड़ी बोली हिन्दी में किया | शकुन्तला की भूमिका में राजा लक्ष्मण सिंह लिखते हैं --“सन्‌ १८६१ ई० में जब कि मेरी स्थिति इटावे जिले में थी, मैंने शकुन्तला नाटक की विलक्षण कविता और अति मनोहर कथा देखकर विचार किया कि यदि महाकवि कालिदास का यह उत्तम ग्रन्थ साधारण हिन्दी बोली में उल्था हो जाय तो इसे लोग बहुत आनन्द से पढ़ेंगे और इससे हिन्दी भाषा की वृद्धि में सहायता पहुँचेगी | ऐसा समकर मैंने अपने थोड़े समय को जो सरकारी कामों से बचता था, इस विषय में लगाया और डेढ़ बरस के भीतर अनुवाद पूरा करके सन्‌ १८६२ ई० में छुपवा दिया |? «




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