मानस रहस्य | Manas Rahsya

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Manas Rahsya by हनुमान प्रसाद पोद्दार - Hanuman Prasad Poddar

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He was great saint.He was co-founder Of GEETAPRESS Gorakhpur. Once He got Darshan of a Himalayan saint, who directed him to re stablish vadik sahitya. From that day he worked towards stablish Geeta press.
He was real vaishnava ,Great devoty of Sri Radha Krishna.

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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श्रीरामावतारके विभिन्न हेतु और उनका रहस्य श्झ जुड़ पी उं जे जि पर जे उंद पद उंए जी कद हुए पी गम जवि जे एगि हर हि जी के कं उ मि और उ उर एर एम हि जौ पर जो जी एंव जी जर जी पे हु जी ऊँ गए जी पु जो उरे उ ही उग ज़ी. जि जि से सी वि हर जी ज़ी लव जी जी की ज़ी जी की झलक रही है । प्रथम कल्पकी कथामें प्रभुको हरि --वैकुण्ठनाथ कहकर अब उन्हींको इस कल्पमें प्रभु और राम कहकर अवतार-अवतारीका ऐक्य सिद्ध कर रहे हैं। इसके बाद यह चौपाई है-- ख़त्ति अवतार कथा प्रभु केरी। सुतु मुनि बरनी कबिन्ह घनेरी ॥ इससे भी प्रभुके सब अवतारोंकी एकता सूचित हो रही है कि इन्हीं म्रभुके प्रत्येक अवतारकी कथा कवियोंने बहुत विस्तारसे वर्णन की है। फिर झाड्टरजी कहने लगे-- नारद श्राप दीन्ह एक खारा। कलप एक तेहिं लगि अवतारा ॥ हे प्रिये एक कल्पमें नारदजीके झापके कारण भगवान्‌को अवतार लेना पडा यह सुनते ही पार्वतीजी चकित होकर कहने लगी कि -- हे प्रभो देवर्षि नारद तो प्रभुके अनन्य भक्त हैं और परम ज्ञानी हैं उन्होंने भगवान्‌कों झाप क्यो दिया ? इस अवसरपर नारद बिंव्तुभगत पुनि ग्यानी तथा का अपराध रमापति कीन्हा ॥ पार्वतीजीके इन वचनोंसे स्पष्ट हो जाता है कि उन्हें राम-स्वरूपका यथार्थ बोध हो गया था तभी तो वह स्वयं विष्णु और रमापति झाव्दोंका उल्लेख करती हैं नहीं तो उन्हें वया ज्ञात था कि नारदने किसे शाप दिया । वस्तुतः बात यह है कि उन्हें इसका पूर्णतया बोध हो चुका था कि प्रभुके दोनो स्वरूप--व्यापक अगुन अकल अभेद निराकार वित्रह तथा वैकुण्ठनाथ क्षीरशायी श्रीविष्णु साकार विग्रह का श्रीरामावतारसे अभेद है अर्थात्‌ इन्हीं दोनोसे रामावतार होता है। क्योर्कि निराकार व्यापक ज्रह्मको झाप सम्भव नहीं है अत. नित्य साकारस्वरूप _ कीरशायी रमापतिको ही झ्ाप देना कहा गया है। श्रीपार्वतीजीके प्रश्नको सुनकर भगवान्‌ श्र दँसकर बोले कि प्रिय प्रभुकी मायाके आगे न तो कोई ज्ञानी है और न मूढ़ है श्रीरघुपति जिस समय जिसको जैसा बनाते हैं वह उस समय वैसा ही बन जाता है । इसके बाद याज्ञवल्क्यजीने भी कहा है-- व - कहँ - राम सुन गाथ भरद्वाज सादर सुनहु । भव भंजन- रघुनाथ भजु तुलसी तजि मान मद ॥




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