संस्कृत - शिक्षण - पद्धति | Sanskrit Shikshna Paddhiti

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Sanskrit Shikshna Paddhiti by पं. सीताराम चतुर्वेदी - Pt. Sitaram Chaturvedi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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संस्कृत शिक्षाके उद्देश्य 1 आव । झर्थात्‌ दम घरमें अपनी प्रादेशिक बोली बोलते हैँ-- किन्तु सामाजिक व्यवहारमें नागरी भाषाका व्यवहार करते हैं । झतः समाजके शिष्ट जन जिस भाषामें विचार- विनिमय काम-काज और लिखा-पढ़ी करते हैं वद्दी भाषा शिक्षाकी दृष्टिसि मातभाषा कहलाती है । अर्थात्‌ यहाँ मात- भाषासे हमारा तात्पय्य उसी भाषासे है जिसके द्वारा दम परस्पर लिख और बोलकर झपने भाव व्यक्त करते हे जिसमें मारे गद्य साहित्यकी रचना हो रही है पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित होती हैं तथा जो हमारे समाजके पढ़े-लिखे शिष्ट- जनाँके बोलचालकी तथा लिखा-पढ़ीकी भाषा है । अतः इस मातभाषाकी शिक्षा देनेका यही उद्देश्य होगा कि हम नाग- रीमें शुद्ध लिख और बोल सके सत्सादित्यकी सुष्टि कर सके तथा समाजमें उचित तथा संस्कृत रूपमें व्यवहार कर सके । इमारी राष्ट्रमाषा नागरी भाषाका वह व्यापक रूप है जिसे समूचे भारतमें तथा भारतखे बाहरके भी कुल मिला- कर कमसे कम बाईस करोड़ प्राणी बोलते और समभते हैं झौर जिसमें देश-भेदके अनुरूप संज्ञा विशेषण झ्ादिके लिये तत्तत्प्रदेशीय शब्दाँका प्रयोग होता रहता है । राष्ट्रभाषासे परिचित व्यक्ति अपने ही देशके झन्य प्रान्ताँमें जानेपर भारी कठिनाईमें पड़ जा सकता है । दम भले ही राष्ट्रभाषा- के विद्वान न हो राष्ट्र भाषा भली प्रकार बोल भी न सके पर समझ सकनेका अभ्यास तो अवश्य ही करना चाहिए । राष्ट्रभाषाका अध्ययन इसी उद्देश्यसे किया जाता है कि दम प्रत्येक देशवा सी को अपनी बात समझा सके छोर उसकी बात समस सके । अआजकल राष्ट्रमाषाका प्रश्न अत्यन्त सरल होते हुए भी




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