जीवन - देवता की वाणी | Jivan Devata Ki Vani

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
11 MB
कुल पष्ठ :
276
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)[ ७ ]कन्दन.ष्वनि ज्यो समुत्यित हो रहीं है, वहाँ एकमात्र आदश से
ही इस वेदना से मानवता की मुक्ति हो सकती दे । किस प्रकार ९
पुरातन संस्कारों के आधार पर अवस्थित जी सभ्यता का ध्वंस
करके, उसके भ्रस्तूप पर नूतन जगत् की, नूतन सस्यता की सृष्ट
करके । इसके लिए सबसे पहले हमें पुरातन संस्कारो एवे मिथ्या
विश्वासों के विरुद्ध संग्राम करना होगा। घर्म के नाम पर, समाज
के नाम पर, प्रचलित रीति-नीति एवं आचार-विचार के नाम पर
जो कपट, जो भीरुवा, जो निष्ठुरता आज समाज के स्तर-स्तर मँ
परिव्याप्त हो रही है; जिसके भुलावे में पड़कर आज कोटि-कोटि
मनुष्य मोहरस्त होकर क्रोतदासवत् जीवन व्यतीत कर रहे हैं,
उसके बाह्य आवरण को छिन्न-मिन्न करके उसका वास्तविक रूप
व्यक्त कर देना होगा। लक्ष-लक्ष आलोकहीन, आशाहीन हृदयों
मे नवजीवन का स्पन्दन जायत करना होगा | स्वाधीनता-लाभ
का दुजेय सङ्कल्प महण करके मन की अद्म्य शक्ति को पुरातन
का ध्वंस करते के कायं मे संलग्न करना होगा । यदी होगा जगत्
के नव-योवन कौ उन्मादना का स्वर सङ्गीत; यदी होगा उसके
जीवन का ध्रुवतारा। क्योंकि उसका काम होगा 6 १97७ 6০
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मानवता की खष्टि। किन्तु इस सृष्टि काय के लिए प्रचण्ड शक्ति
का प्रयोजन है। वह प्रचण्ड शक्तिः जो ज्ञान एवं कम के बीच ,
समन्वय स्थापित करेगी, जो ज्ञान को कर्म-साधना से विच्छिन्न
करके नहीं रखेगी, जो ज्ञान को कर्मसाधना का एकान्त साधन
वनाकर उसके द्वारा जीवन को चरिताथं करेगी । किन्तु एक अर '
जो हमें ज्ञान एवं कमं मे समन्वय स्थापित करना होगा, वहो

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