भोरे से पहले | Bhore Se Pahle

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Bhore Se Pahle by अमृत राय - Amrit Rai

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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करने के अंदाज में कहा ओर अपने जलते हुए होंठ इन्दु के होंठों पर रख दिये। न यह सब्र ऐसा च्िजली की तरह हुआ किं इन्दु एकदम बौखला गया, मगर तो भी. उसे लगा (कि जैसे किसी ने उसके होंठों पर श्र॑गारा रख दिया हो | गुस्से से उसकी आँखें लाल हो गयीं और नथने फड़कने , : लगे | उसने भका देकर पुतुल को अलग किया ओर मजबूत हाथों से उसके कन्धों को पकड़ कर पूरी ताकत से उन्हे भकभोरते हुए भारी ` करख़्त आवाज म॑ चिल्लाकर उसने कहा-+हाँ दिये थे ...दिये थे. . . इसी क लिए दिये थे {. . .तुम उसे चुकता करोगी. . -ठम उसे चुकता करोगी.. .तुम उसे चुकता करोगी. . .कहते हए. उसने जोर से उसे धक्का दिया और पुतुल जाकर सीधी खाट की पाटी पर गिरी | इन्दु ने ठिबरी लेकर ज़मीन पर पयक दी ओर कोठरी के किवाड़ों को भपाटेसे वंद करता हुआ तेजी से कमरे के बाहर हो गया | भपाटे से दरवाजे का बन्द होना सुनकर माधवी श्मपनी कोटरी से निकल कर आयी | इन्दु चला जा रहा था ओर पुतठुल पाटी से लगी लगी सिसंक रही थी। उसके शरीर को भी कुछ चोट लगी थी लेकिन उससे-कहों ज्यादा ओर असल चोट लगी थी उसके मन को आर वह चोट सिफ इतनी नहीं थी कि इन्दु ने उसका अपमान किया ই. माधवी ले पुतुल का हाथ पकड़ कर+उठाने की कोशिश करते हुए कहा-- पागल हो गयी है पुतुल ? वह चला गया | जानवर ! उज्जडड गँवार ! | पुल को माधवी के समवेदना के ये शब्द ज़हर जैसे लगे । उसने आंखें उठा कर एक मिनट, अपलक देखा ओर आदेश के ख्बर में 'कहा--दोदी तुम यहाँ से चली जाओ. . . भोर से पहले द है




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