रवीन्द्र - साहित्य भाग - 13 | Ravindra Sahity Bhag - 13

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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कणे-कुन्ती-संवाद्‌ : कान्य आज इस रजनीके तिमिर ~ पलक धर तारके प्रकाशमें प्रत्यक्ष होता छगोचर्‌ मुझे घोर युद्धफल । इस स्तब्ध शब्दहीन ज्ञणमें अनन्त नीलाकाशसे विचारलीन मनमें प्रवेश मेरे कर रहा एक क्षीण जयहीन चेष्टाका संगीत, एक आशाहीन कर्मोद्रम-राग । सुमे स्पष्ट आज दीख रहा शान्तिमय शल्य परिणाम । मानो मेरा कटा, दार जिस प्तक दै धरी, आज तोड़ नाता त्याग दूँ में उसे, ऐसी आज्ञा मत देना माता । जयी हां, राजा हो, पायें पाण्डव-सन्तान मान, निष्फल हताश दल्वारछोमि दै मेरा स्थान) जन्म-राजिको ही मुझे! फेंक दिया (थ्वीपर, माता, मुझे नाम-हीन-ग्रह-हीन दीव कर। ममता-विहीन होके आज भी उसी प्रकार रहने दो, दीप्ि-हीन, कीर्ति-हीन, अनुदार गतेमें पराभवके छोड़ मुझे अविषाद। मुझे! बस देती जाओ आज यही आशीर्वादि--- जय-लोभ, यशोलोभ, राज्य-लोभ हेतु कहीं बौरकी सद्रतिषि, है माता, भ्रष्ट होऊँ नहीं । १३




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