समंतभद्र-विचार-दीपिका - भाग 1 | Samantbhardra-vichar-dipika - Voll-1

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
1 MB
कुल पष्ठ :
40
श्रेणी :
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लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
जैनोलॉजी में शोध करने के लिए आदर्श रूप से समर्पित एक महान व्यक्ति पं. जुगलकिशोर जैन मुख्तार “युगवीर” का जन्म सरसावा, जिला सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। पंडित जुगल किशोर जैन मुख्तार जी के पिता का नाम श्री नाथूमल जैन “चौधरी” और माता का नाम श्रीमती भुई देवी जैन था। पं जुगल किशोर जैन मुख्तार जी की दादी का नाम रामीबाई जी जैन व दादा का नाम सुंदरलाल जी जैन था ।
इनकी दो पुत्रिया थी । जिनका नाम सन्मति जैन और विद्यावती जैन था।
पंडित जुगलकिशोर जैन “मुख्तार” जी जैन(अग्रवाल) परिवार में पैदा हुए थे। इनका जन्म मंगसीर शुक्ला 11, संवत 1934 (16 दिसम्बर 1877) में हुआ था।
इनको प्रारंभिक शिक्षा उर्दू और फारस
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)वीतरागकौ पूजा क्यो ? १३वस्तुतः अनेकान्त, भाव-सअभाव नित्य-अनित्य मेद-अभेद
आदि एकान्तनयोके विरोधकों मिटाकर, वस्तुतत्त्वकी सम्यक-
त्यवम्थां करनेवाला है उमीसे लाक्-व्यवहारका सम्यक् प्रवतक
है--बिना अनेकान्तका आश्रय लिये लाकका व्यवहार दीक बनता
ही नही, और न परस्परका वैर-विरोध ही मिट सकता है।
टसीलिये अनेकान्तका पस्मागसका बीज ओर लाकका अदड्ठितीय
[रू कहा गया है -वह सबोके लिये सन्मार्ग-प्रदर्शक है %। जैनी
नीतिका भी वही मूलाधार हे । जो लोग अनेकान्तका सचमुच
आश्रय लेते है व कभी म्व-पर-बेरी नहीं होते, उनसे पाप नहीं
यनते, उन्हें आयठाएँ नहीं सताती, और वे लोकमे सद्धा ही उन्नत
उदार तथा जयशील बने रहते ४ ।~२म क क्योयीतरागकी पूजा क्यों
जिसकी पूजा की जाती रै वह यदि उस पूजास प्रमन्न होता
और प्रसन्नताक फलस्वरूप पूजा करनेवालंका कोई काम बना
दता अथवा नुधार देता है ता लोकमें उसकी पूजा साथक समभी
जाती है । और प्रजास किसीका प्रसन्न हाना भी तभी कहा जा
सकता चयाना ह उसक बिना अप्रसन्न रहता हा, या
उससे उसकी प्रसन्नतामे कुछ वृद्धि होती हा अथवा उससे उसका
काई दूसरे प्रकार्का लाभ पहुँचता है।, परन्तु वीतरागदेवके विषय
में यह सब कृझ भी नहीं कहा जा सकता--वे न किसीपर प्रसन्न
हेते है, न अप्रसन्न ओर न किसों प्रकारकी का$ इच्छा ही रखते
है, जिसकी ३ति-अप्र्तिपर उनकी प्रसन्नता-अश्रसनज्नता निभेर% सीति-विरोउ-च्वर्सी लोक॑व्यवहारवतके सम्यक
परममर बीज भुततैकगुरूजयत्यनेकान्त: ॥
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