वैदिक संस्कृति और सभ्यता | Vaidik Sanskriti Aur Sabhyta

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Vaidik Sanskriti Aur Sabhyta by डॉ. मुंशीराम शर्मा - Dr. Munsheeram Sharma

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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অনি: অজ खं यषा क संस्कृति की अवधारणा एंसकृति का अर्थ है संस्करण परिमार्जन, शोषन परिष्करण भर्पात्‌ देसी क्रिया लो स्पक्ित में निर्मतता का संचार करे। अनेक स्यगित मिसकर समाज तथा जाति का निर्माण करते हैं। भ्रत निर्मस एम संस्कृत स्यक्तियों के समाज तपा राष्ट्र भी षं होते हैं जौर उसके निर्मला विधायक तत्व सस्क्ृति के मूल सूर बन जावे हैं। जायकल हिस्दी में छंस्कृति शम्द अंग्रजी के कल्चर ফতেহ का पर्यामबात्री जन गया है। कल्चर का विशुद्ध पर्यायवात्री बेदिक शब्द कृष्टि है। कसे कृषि कर्म में भूमि का संश्रोघन तपुपरास्थ शीजबपन किया बाता है और सित्रन तिए्यत शआवि द्वारा आवश्यक छंस्कार्रो का संस्पर्श देकर भूमि को हस्य सम्पप्र बनाया जाता है षेये ही मातग-मातस में सत्संस्कारों द्वारा विकास की ध्रूमिका तेमार की जाती है। भिस मालका मन जितमा ही अधिक विकार रहित तथा बिशुद्ध है, उतता ही जधिक बह उंक्तत कहा जाता है । बिलुद्धि निर्मसता परिष्कृति एक मानद ऐे चरत्त कर जैसे समाज तथा जाति की संपत्ति बनती है उसी प्रकार बह गिश्ञ मर की घाती मी बत सकती है | संस्कत के इस ब्मापक झूप को লহ 'विश्ववारा स॑स्‍्कृति' का नाम देता है | सदुर्थेद के प्म अध्याय के १४वें मस्त्र मैं सा प्रथमा सस्कृति' गिददवारा' छो पद याता है बहू गिश्व मर के छिएं बरणीय सं्कृति को प्रथम या सर्वप्रमुख कहता है । सम्यता देष विषेपके के अनुसार अपने रूप में हृसरी सम्पार्मों से पृषक हो सकती है परन्तु संस्कृति तो विश्व मर की एक ही होगी । प्री सानभों का शान्तरिक विकास एक ही पद्धति से होता है। इस बिकास के मूल में अच्छिप् सुदीस्ये की प्रतिष्ठा) निराश में बागे जाने बाले रायस्पोप आदि बोर्य की अक्षपप्ता बलबती शक्ति पर ही अवसंबित है। उपनिषद्‌ की रमि का पोषण मास्तरिक ठथा बाह्य दोगो ही क्षेत्रों में एसी मूल बिम्बु पर जाधित है। बीर्म को रस्ता बहां ब्यवित को तेजस्वी ठपा पदाब्रार-परायण बताती है, बहां बहू लाति तथा बिश्यमर को सदाचार की जोर है छाती है। कामुक ब्यमित बाइर से सम्य होते का डोंप भले ही कर से, पर बह अाइर से संछ्कुठ रहीं हो सकता । मौकसफोर्ड डिवशनरी में छुम्बर' शब्द की परिभाषा इप प्रकार की गई है ---




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