तथागत | Tathaagat

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Tathaagat by रामवृक्ष बेनीपुरी - Rambriksh Benipuri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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तथागत - ञुद्धोदन--ध म॑-प्रव तंक ! सचिव--तपस्वी, भिज्ञ ! ( प्रजावती का प्रवेश ) प्रजावती--महर्पि, महषि ! यह कया कह रहे हैं आप ? माया का पुत्र ओर भिक्ु ! माया असूतिग॒ह में ही चल জী? তা ভুল कौण्डिन्य--( हँसते हुए ) रानी प्रजावती, मायारानी अकेली गई; किन्तु आप अकेली नहीं जायेंगी, एक पूरा महिला-समाज आपका अनुसरण करेगा। अच्छा, में चला महाराज ! शुद्गोदन--यह आप र्या कहे जा रहे हैं महर्षि ! कौण्डिन्य--जो लिखा हुआ है, वही । नमस्कार महामंत्री ! २ | प्रथम ऋखेट : कपिलवस्तु ॐ निकट की वनस्थली | उदय-मारिये तीर कुमार, वह. ..... पिद्धाथ--वह्‌ ! किधर उदयौ! उदय--वह देखिये, वह एक मृग-छोना खड़ा है ! पिडार्ब--कितनी बड़ी-बड़ी उसकी आँखें हैं. उदयी ! इतनी सुन्दर आँखें आदमी को क्यों नहीं दी गई' ? उदय--भाग जायगा कुमार, भाग ! जल्दी निशाना लीजिये । पिद्धाथ--निशाना ? इसपर तीर ? उदयी) इच्छा होती ই, ठप




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