मूक माटी | Mook Maati

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
8 MB
कुल पष्ठ :
515
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)अशंबिसे पामे ले वशा न वाते सहौ
अन्यथाहमारा रधिर लाल होकर भो
इतना द्ध क्यों ?और सेठ से मच्छर कहत्ता हैसूला प्रलोभन मत दिया करो,स्वाधित जोवन जिया करो,कपटता की पदता कोजलांगलि दो |गुदता को जनिका लघुता कोभदांजलि दो)शालौनता कौ विज्ञालता मेंआकाश समा जाय,जोन उदारता का उदाहरण बने;धकारण ही-परके वख कासदाहरणहो।भौर अन्त मे पाषाण-फलक पर असीन नीराग साधु को वन्दना के उपरान्तस्वयं आतकषवाद कहता हैहै स्वामिन्, समग्र ससार हो दु.छ से ब्र हैयहाँ सुह, पर वैषयिक, ओर बह भीं क्षणिक !
यह तो अनुभत हुआ हमें,परन्तु अक्षय सूख पर विश्वास नहीं हो रहा है ।
हाँ, हाँ, यदि अविनद्वर सुक्ष पासे के बादआप स्वय उत्त सल को हमें बिला सकते याउस विवय में अपना अनुभव बता सकते तोहम भी माहवस्त हो आप जेसी साधना को
जोबन में अपना सकें ।तुम्हारी भावना परो हो, रेते वन दो हे,
बड़ी कपा होगी हम पर ।गुरु तो प्रवचन ही दे सकते हैं, 'बचन' नहीं । आत्मा का उद्धार तो अपने
ही पुरुषार्थ से हो सकता है और अविनश्वर सुथ्थ बचनों से बताया नहीं जा
सकता । बह तो साना से प्राप्तं आस्मोपसम्धि है। साधु की देशना है :
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