सूना मंदिर | Suna Mandir
श्रेणी : साहित्य / Literature
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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
18 MB
कुल पष्ठ :
159
श्रेणी :
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लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)नाज री,
१६ सूना मन्दिर
तभी मौसी की आवाज सुनायी दी ओर मेरी आँख खुली | सभी सुंदर
सपने भिस तरह अधूरे दी क्यो रह जाते हैं !
जेसे दी बाहर ञ्रुकर आयी तो सामने ही चितोपंत का थूथना दिखायी
दिया । मोती हमेशा कहा करती ह कि यह चितोप॑त तो मेरा एक प्यारा,
झबरा सा कुन्ता है ।-ठेकिन युते देखते दी मञ्चे तो भीद्ड की याद हो
आती हे | छेकिन कते हँ कि सवेरे स्मेरे नीदसे थुठते ही, मीदड् क्रा
मुह देखना बडा ही कल्याणकारी होता है। ओर मैंने तुरंत द्वी अनुभव
किया कि यह कथन बिल्कुक सच है |
कभी दिनों से सोचती थी कि डे
+
अकवार अशोक को अपने घर खाने या
चायपर बुलाअंगी | छेकिन कोंजी बहाना ही नहीं मिल रहा था| कल
समाम आअुनका भाषण सुनने के लिये मोसी भी आयी थी । अरोक का
भाषण सुनकर मासी अत्यंत प्रभावित ही ओर अनक प्रति असके दिल में
घड़े ही आदर का भाव निर्माण हुआ | घर आने पर मेने अशोक को
अपने घर किसी दिन खाने पर बुढाने का जिक्र किया | मौसी ने तुरंत
अरे, तो जिसमें सोचने की क्या बात है ! कछ ही बुछा छो न
ओअन्हें |? मेरा ख्याल था कि कहीं यह कमबख्त चिंतोपंत फिजूल दी, बीच
में टांग न अड़ायें | लेकिन मोसी का बाल्य-सखा होने के कारण यह
शैतान यहाँ का ठेकेदार बन बैठा है तो क्या हुआ ! अश्रमं तो वहं
अशोक के मातहत में ही काम करता है | जैसे ही मोसी ने अशोक को
बुलाने के लिये कहा, ओअसने असी सुरत बनायी मानो मुणष्किल से कड्ुओ
दवाओ का घूढ इक के नीचे आतार रहा हो | असने कड्ओ सूरत तो जरूर
बना दी लेकिन मुह से कहा कुछ नहीं | चुपचाप सिर झुकाओ षेठा रहा |
अशोक के घर जाने के छिये में कपडे बदलने लगी | साड़ी बदरूते
हुये, परसो का वह गीत भ गुनगुना रहीं थी - भरी में तो प्रेम-दिवानी---
अस चितोपत के कान बहुत ठंबे दं] बाहर दी से युखने पृष्ठ
£ कहिये पुष्पा बहन, किसके प्रेम में दिवानी हओी हों ! ?
अशोक के प्रेम में . यह जवाब बिलकुछ मेरे होठोंतक आया था !
लेकिन दूसरेंहि क्षण मांकी गोद में आने के लिये दरवाजे तक दौढते रुभे
आकर सहसा अुसकी ओट में छिप जानेवाले घाकूक का सा मेरा हाल हो
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