स चि त्र चौदह विद्या सागर | Sachitr Chaudah Vidhya Sagar
श्रेणी : इतिहास / History

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
15 MB
कुल पष्ठ :
208
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)( १५ )जो सोते बेंठे चलते, फिरते गाते ह ।
अथवा आसतन्त सो बैठे, नहीं बोह रोते चिल्लाते है ॥
লী दुख महाराग कदि पावे, यासे भूठ न जानो ।
तासों गायन हेत गेया आसन लहि सुख मानो ॥गायन भेद गात )पोच भांति के गायन कहे, तिनमे सेद् सब यों लहे।
सिद्धा कारक अर् अनुकार, अनुभावक पंचम अधिकार ॥
सिषये सकल खीख कर लेय, सिद्धा कारक किये साय ।
छाया काहू और की, लेतु वुद्धि बलदान ।
सो अनुकारक बड़ो दहै, सिद्ध चतुर शुन खान ॥गायन अ्रकार ।'गायन तीन प्रकार के, कहै गुनी जन गाय
येकल यमल सुबरन्द दहै, लच्ए कदो सुनाय॥
जो आपु ही गाके सदा, येकलं किये तादि ।
-जो गारे मिल्ल दो जने, यमल कहीजे ताहि ॥
-कददिये गायन चन्द् सा, जो गावें मिल जूह ।
-रूप सुजोबन मधुरता, ये गुण अधिक समूह ॥भरायन |छाया लागें शुद्ध की, जाने सिगरी रीति।
ताको गायन कहत है, जे पंडित संगीत ॥
गायन में जे होत है, दोष बीस अरु पाँच !
(तिनके लक्षण कहत हो, जान लेहड्ु तुम साँच ॥
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