केशव कौमुदी | Keshav Kaumudi

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Keshav Kaumudi  by भगवानदीन - Bhagawanadeen

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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# श्रीगशोशायनमः # हर ৫ आरामचान्द्रका | सटीक ( पहिला-प्रकाश ) दो०-यहि पहिले परकाश में मंगल चरण विशेष । ग्रन्थ, र भरू आदि শ্রী कथा लहहिं बुध लेख ॥ ( गणेश बंदना ) सूल-( दंंडक ) बालक मृणालनि ज्यों तोर डारै सब काल कठिन कराल त्यों अकाल दीह दुग्च की । विपति हरत हठि पदूमिनी के पात सम पंक ज्यों पताल पेलि पठवे क्लुख को | दूर कै कलर छक मव्र-सीम-सपि स्म राखत हैं केशोदास दास के बपुर को | साँकरे शी साँकरन सनमुख होत तोरै दशमुख मुख আন गनमुख-मुख को ॥ १॥ शब्दार्थे--वालक >- हाथी का बच्चा । मृणाल --पौनार, मुरार | दीह -- दीघ, बड़ा । पद्मिनि--पुरहन । पर= कीचड़ । कलु =, कलुष, पाप। अंक = चिष्ठ | भव = महादेव | वपु ( वपुष ) == शरीर । सॉकरे -- संकट । साकरन = जंजीग । दशमुन्=दशो ।दशाश्रौ । मुख = मुंह ( यहाँ लक्षणा से मुख्वले श्रथात्‌ लोग )। मुव (को) जोर्वै > मुख देखते हैं श्रथवा कूपाकक्षी रहते ह । गजमुख = गणोश । भावाथ--जैमे हाथी का बच्चा सब काल में (हर एक दशा में ) कमलनाल को तोड़ डालता है वै1 ही श्रीगणेशनी अ्रकाल के बड़े-बड़े और कठिन और । कराल ) भयंकर दुःगवों के तोड़ डालते हैं ( श्रौर ) विपत्ति का, हठ करके. पुरइन के पत्तों के समान ( हरत ) खींचकर तोड़ डालते हैं श्लौर पाप को कीचड़ की भाँति दबाकर पाताल के भेज देते हैं। ( और ) अपने दास के शरीर से, कलंऋ का चिह्न दूर करके, शिव के मस्तक पर रहने वाले चन्द्रमा के समान (कलंक रहित और वंदनीय) करके उसकी ( रुदैव ) फे० को०-- र म ७०. টপ भ 0 भि त भ क भ न পাপা शि = (हि क = ++ भ




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