सुख क्या है | Sukh Kya Hai

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Sukh Kya Hai by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( १६ ) उक्त प्रयोजन की सिद्धि हेतु जिन वास्तविकताओ्ों की जानकारी आवश्यक है, उन्हे प्रयोजनभ्रत तत्त्व कहते हैं तथा उनके सम्बन्ध मे किया गया विकत्पात्मक प्रयत्न ही तत्वविचार कहलाता है । म कौन ह ?' (जीव तत्त्व), पूणं सुख क्या रै ? (मोक्ष तत्त्व), इस वैचारिक प्रक्रिया के मूलभूत प्रश्न हैं । मैं सुख कंसे प्राप्त करू श्रर्थात्‌ आत्मा अतीन्द्रिय-प्रावन्द की दशा को कैसे प्राप्त हो ? जीव तत्त्व मोक्ष तत्वरूप किस प्रकार परिणमित हो ? आात्माभिलापी मुमुक्षु के मानस में निरन्तर यही मथन चलता रहता है । वह्‌ विचारता ह कि चेतन तत्त्व से भिन्न जड तत्व की सत्ता भी लोक में है। आत्मा में अपनी भूल से मोह-राग-द्वेप की उत्पत्ति होती है तथा शुभाशुभ भावों की परिणति मे ही यह आत्मा उलभा (वबंघा) हुआ है । जब तक आत्मा अपने स्वभाव को पहिचान कर आत्मनिष्ठ नही हो जाता तव तक मुख्यतः मोह-राग-हेंप की उत्पत्ति होती ही रहेगी। इनकी उत्पत्ति सके, इसका एक मात्र उपाय उपलब्ध ज्ञान का अत्म-केन्द्रित हो जाना है। इसी से शुभाशुभ भावों का अ्रभाव होकर बीतराग भाव उत्पन्न होगा और एक समय वहू होगा कि समस्त मोह-राग-द्वप का भ्रभाव होकर आत्मा वीतराग-परिणति रूप परिणत हौ जायगा । दूसरे एब्दो मे पणं सानानस्दमय पर्याय रूप परिणमित हो जायेगा । उक्त वैचारिक प्रक्रिया ही तत्वविचार की श्रेणी है । स्वानुभूति प्राप्त करने की प्रक्रिया निरन्तर तत्त्वमरयन की




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