स्वामी समन्तभद्र | Swami Samant Bhadra

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Swami Samant Bhadra  by जुगलकिशोर - Jugalkishor
लेखक :
पुस्तक का साइज़ :
9 MB
कुल पृष्ठ :
282
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लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

जैनोलॉजी में शोध करने के लिए आदर्श रूप से समर्पित एक महान व्यक्ति पं. जुगलकिशोर जैन मुख्तार “युगवीर” का जन्म सरसावा, जिला सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। पंडित जुगल किशोर जैन मुख्तार जी के पिता का नाम श्री नाथूमल जैन “चौधरी” और माता का नाम श्रीमती भुई देवी जैन था। पं जुगल किशोर जैन मुख्तार जी की दादी का नाम रामीबाई जी जैन व दादा का नाम सुंदरलाल जी जैन था ।
इनकी दो पुत्रिया थी । जिनका नाम सन्मति जैन और विद्यावती जैन था।

पंडित जुगलकिशोर जैन “मुख्तार” जी जैन(अग्रवाल) परिवार में पैदा हुए थे। इनका जन्म मंगसीर शुक्ला 11, संवत 1934 (16 दिसम्बर 1877) में हुआ था।
इनको प्रारंभिक शिक्षा उर्दू और फारसी में मिली। 13-14 साल की उम्र में शादी के बाद, उन्होंने जैन दर्शन, हिंदी, संस्कृत, प्राकृत और अंग्रेजी भाषाओं का अध्ययन शुरू किया।

पंडित जुगलकिशोर जी एक पत्रकार और एक साहित्य संपादक के क्षेत्र में अपनी पूरी क्षमता को प्रकट करते थे, जिससे वे यूगवीर के उपनाम से जाने जाने लगे। यह साहित्य बनाने में सच्चाई को संरक्षित रखने के लिए एकपत्रकार का सबसे बड़ा कर्तव्य है
और यह पंडित जुगलकिशोर जी के जीवन और साहित्य से स्पष्ट है। पंडित जुगालकिशोर जी समाज के सामने अपने मूल और प्राकृतिक विचार को किसी भी पक्ष से डर के बिना उसे एक बहुत ही दृढ़ तरीके से प्रस्तुत करते थे। एक पत्रकार के रूप में पंडितजी का जीवन 01 जुलाई 1906 में शुरू हो गया था इसके बाद इन्होंने जैन गजट (अखबार) के संपादक का पद स्वीकार कर लिया था जो जैन समाज का आधिकारिक अखबार प्रकाशन था।जैन गजट (अखबार) के संपादक बनने पर उन्होंने शोध गतिविधियों में गहरी दिलचस्पी ली। इनके सम्पादक की शैली को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है। (i) भाषा विज्ञान में अनुसंधान (ii) समाज की सेवा और (iii) साक्ष्य संग्रह।
उनके संपादकीय गतिविधियां ताकत से भरी थीं, जो सामाजिक सुधारों की ओर इशारा करती थीं और इसलिए इनके लेखों को लोगो ने पसंद किया व इनका सम्पादक के रूप में स्वागत किया। इससे जैन गजट अखबार के ग्राहकों की संख्या 300 से बढ़ कर 1500 हो गई। लेकिन कुछ सामाजिक नेता सामाजिक रीति-रिवाजों व प्रथाओं पर उनकी स्पष्ट सोच से नाराज थे और इसलिए पंडित जुगलकिशोर को जैन गजट के संपादक के रूप में अपना काम छोड़ना पड़ा।
ये 1906 से 1909 तक *जैन गजट अखबार* के सम्पादक रहे।

1906 में जैन गजट अखबार के संपादक बनने पर उन्होंने शोध गतिविधियों में गहरी दिलचस्पी ली। इसी समय ये न्यायाचार्य पं दरबारी लाल जी जैन कोठिया के सम्पर्क में आये। तथा इनके साथ मिलकर इन्होने जैन साहित्य के शोध में दिलचस्पी ली और मुख्तार के रूप में कार्य करते हुए अपने सफल अभ्यास के 10 वर्षों के बाद उन्होंने फरवरी, 1914 में जैन साहित्य के अनुसंधान और निर्माण के लिए खुद को समर्पित कर दिया । 1914 में इन्होंने अपनी निवास स्थान सरसावा में न्यायाचार्य पं दरबारी लाल जी जैन कोठिया की सहायता से एक “जैन अनुसंधान केन्द्र” व “पुस्तक प्रकाशन केन्द्र” की स्थापना करी। जिसका नाम पं. जुगलकिशोर जैन मुख्तार जी ने समंतदभद्र आश्रम रखा। यहाँ से इन्होंने अपने द्वारा लिखी बहुत सी पुस्तकें प्रकाशित की तथा यह आश्रम संस्थान आज भी वीर सेवा मंदिर के नाम से गुरुद्वारा के बराबर में, अम्बाला रोड़, सरसावा जिला- सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) में अपनी इमारत में स्तिथ है
जैन गजट के सम्पादन को छोड़ने के लगभग 10 साल बाद 1919 ईस्वी में पंडित श्री नाथुरामजी प्रेमी जी ने पंडित जुगालकिशोर को जैन हिताशी के संपादक के रूप में नियुक्त किया। जहां उन्होंने मेहनत व जिन भक्ति के साथ लगभग दो वर्षों के लिए दृढ़ संकल्प से 1921 ईस्वी तक काम किया था।
कुछ समय उपरांत इन्होंने जैन साहित्य के अनुसंधान और शोध के कार्यो को सरसावा से करने में दिक्कत महसूस की व अपने अनुसंधान को विश्व तक पहुचने के लिये इन्होंने दिल्ली में कार्य करने का निर्णय लिया ।
तथा अनुसंधान कार्य शुरू करने के लिए महावीर जयन्ती के अवसर पर अनुमोदित प्रस्ताव पर पं. जुगलकिशोर जैन मुख्तार जी ने 21 अप्रैल सन् 1929 को समंतदभद्राश्रम की स्थापना दिल्ली के करोलबाग में की। इस आश्रम से अनेकान्त मासिक शोध पत्रिका का नवम्बर 1929 ईस्वी से प्रकाशन प्रारम्भ किया। यह जैन शोध पर सबसे अच्छे पत्रिकाओं में से एक है।

इन दोनों समन्तदभद्रा आश्रम (सरसावा व दिल्ली) संस्थानो को वैशाख शुक्ला 3, वीर संवत 2462 (विक्रम संवत 1993) 24 अपैल 1936 को वीर सेवा मंदिर के रूप में संस्थापित कर दिया । इसके कुछ समय बाद वीर सेवा मंदिर सरसावा को पुस्तकालिय में बदल दिया गया था।
तथा वीर सेवा मंदिर दिल्ली संस्थान से जैन साहित्य की विभिन्न शोध प्रवृत्तियों का अनुसंधान और प्रकाशन होने लगा। जुलाई 1955 ईस्वी को वीर सेवा मंदिर दिल्ली में एक रजिस्टर सुसाइटी के रूप में प्रसिष्ठित होकर आज तक समाज की सेवा में लगी हुई है वीर सेवा मंदिर दिल्ली सुसाइटी आज भी अपनी इमारत 21,दरियागंज दिल्ली में स्थापित है। वीर सेवा मंदिर दिल्ली सुसाइटी जैन साहित्य और इतिहास के सम्बन्धों में अन्वेषण करने वाली एक प्रमुख संस्था है। यहाँ जैनोलॉजी के विभिन्न पहलुओं पर एक अग्रणी संस्थान, पुस्तके प्रकाशन व अनुसन्धान सामग्री है । पं जुगलकिशोर जी ने गहरे अध्ययन के बाद गम्भीर और कठिन विषयो पर प्रमाणिक रूप से लिखा है।

इस काम में पं जुगलकिशोर जी ने अपनी उच्च शिक्षा और गुणवत्ता साहित्य बनाने की क्षमता स्थापित की।उनकी लिखने की शैली बहुत अच्छी थी उन्होंने लेखन की शैली से समाज का एक बड़ा हिस्सा आकर्षित किया। जुगल किशोर जी ने इस मासिक पत्रिका के माध्यम से जनता के हितों की सार्वजनिक नीति और सार्वजनिक हितों की जानकारी दी।

इनकी दादी का स्वर्गवास 7 जून 1945 में हुआ। इनकी दादी को अनित्य-भावना बहुत पसंद थी। तो इन्होंने अपनी दादी की स्मृति में अनित्य भावना (हिंदी पद्यानुवाद और भावार्थ सहित) पुस्तक का नवम्बर 1946 में प्रकाशित किया। इन्होंने अपनी पुत्रियो की स्मृति में सन्मति-विद्या-प्रकाशमाला प्रकाशित की । इस प्रकाशमाला में प्रथम संकरण “अनेकांत रस लहरी”
द्वितीय संकरण “समन्तभद्र विचार दीपिका (प्रथम भाग)”
तृतीय संकरण “बाहुबलि जिन पूजा”
चतुर्थ संकरण “सेवा धर्म (निबंध)”
पंचम संकरण “परिग्रह का प्रायशिचत(निबंध)”
प्रकाशित किये।

इनके 35 कार्यों में से,
जैन साहित्य और इतिहास पर विश्व प्रकाश,
जैन आचार्यॉन-का-शसन भेद,
जैन ग्रंथ परीक्ष (4 खंड),
युगीर निभाधवली (2 खंड),
युवीर भारती,
स्वयंभू-स्टोत्रा,
समचिन धर्म शास्त्र,
अध्यात्मा- राहसाया,
युक्युतुष्सन,
तात्वानुशसन,
रत्नाकरंद श्रवकाचर,
कल्याण-कल्पद्रम,
योगसार प्रभात आदि
प्रमुख महत्वपूर्ण साहित्यिक रचनाएं हैं।
*वीर सेवा मंदिर के प्रकाशन*
1) समाधितन्त्र और इष्टोपदेश
संस्कृत और हिंदी टीका सहित
2) बनारसी नाम माला
पद्यात्मक हिंदी शब्दकोश शब्दानुक्रम सहित
3) अनित्यभावना हिंदी
पद्यानुवाद और भावार्थ सहित
4) उमास्वामी श्रावकाचार परीक्षा
ऐतिहासिक प्रस्तावना सहित
5) विवाह समुद्देश्य
6) न्याय दीपिका
7) प्रभाचन्द्रका तत्त्वार्थसूत्र-
हिंदी अनुवाद तथा व्याख्यान सहित
8) सत्साधु स्मरण मंगलपाठ
श्री वीर – वर्द्धमान और उनके बाद 21 महान आचार्य के 137 पुण्य स्मरणो का महत्व का संग्रह हिंदी अनुवाद सहित
9) अध्यात्म कमल मार्तण्ड
विस्तृत प्रस्तावना सहित हिंदी अनुवाद
10) पुरातन जैन वाक्य सूची( जैन प्राकृत पद्यानुक्रमणी)
63मूल ग्रन्थों और ग्रन्थकारों के परिणय को लिए हुये विस्तृत प्रस्तावन
11)स्वंमभू स्तोत्र
12) जैन ग्रन्थ प्रशस्ति संग्रह
संस्कृत व प्राकृत के 150 अप्रकाशित ग्रन्थों की प्रशस्तियो मंगलाचरण सहित अपूर्व संग्रह
13) स्तुति विद्या
14) युक्त्यनुशासन ( तत्व ज्ञान से परिपूर्ण समत्तभद्र जी की असाधारण कृति)
हिंदी अनुवाद पं जी ने किया
15) अनेकांत रस लहरी
16) समन्तभद्र विचार दीपिका( प्रथम भाग)
17) बाहुबली जिन पूजा
18) सेवा धर्म ( निबंध)
19) परिग्रह का प्रायशिचत (निबंध)
20) मेरी भावना

1916 में रचित उनकी छोटी काव्य रचना ‘मेरी भावना’ ने राष्ट्रीय महत्व प्राप्त किया है। यह एक सच्चे नागरिक के उच्च आदर्शों को दर्शाता है।
17 जुलाई सन् 1954 में वीर सेवा मन्दिर दिल्ली के वर्तमान भवन का शिलान्यास दरियागंज, दिल्ली में सम्पन्न हुआ। 12 जुलाई सन् 1957 को इसका लोकार्पण किया गया, संस्था का समृद्ध पुस्तकालय एवं सर्वश्रेष्ठ ग्रंथों का भंडार विद्वानों के अनुसंधान हेतु 28 जुलाई 1961 को समाज को सर्मिपत किया गया। वर्तमान में ग्रंथालय में प्राकृत, संस्कृत, अपभ्रंश, हिन्दी, अंग्रेजी एवं उर्दू आदि भारतीय भाषाओं की सात हजार से अधिक प्राचीन एवं नवीन ग्रंथों का संग्रह है। इस पुस्तकालय में 167 हस्तलिखित ग्रंथ भी हैं जिनमें ज्योतिष, आयुर्वेद व इतर धर्म शास्त्रों के विषय र्गिभत हैं। इसके अतिरिक्त पुस्तकालय में ताडपत्रों पर काटों से उकेरे गए वसन्ततिलक, राजा विज्जल कथा एवं धन्यकुमार चरित आदि हस्तलिखित ग्रंथ भी सुरक्षित हैं। इस पुस्तकालय में दिगम्बर ग्रंथों के अतिरिक्त श्वेताम्बर जैन आगम ग्रंथ, वैदिक एवं बौद्ध साहित्य के अनेक महत्त्वपूर्ण मुद्रित ग्रंथ भी उपलब्ध हैं। संस्था के द्वारा महत्त्वपूर्ण ग्रंथों का प्रकाशन समय—समय पर किया जाता रहा है। जिनमें मुख्यत: पुरातन जैन वाक्य सूची, जैन लक्षणावली व अंग्रेजी भाषा में बाबू छोटेलाल जैन द्वारा रचित जैन बिबिलियोग्राफी (दो भाग) है। संस्था के द्वारा बहुत से ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं। संस्था के उद्देश्यों की र्पूित के लिए अनेकान्त शोध पत्रिका का निरन्तर प्रकाशन किया जा रहा है। संस्था की साहित्यिक गतिविधियों को मूर्त रूप प्रदान करने में पं. पद्मचन्द्र शास्त्री का विशेष योगदान रहा है। समय—समय पर अनेक आचार्यों और मुनि महाराजों का आशीर्वाद एवं प्रेरणा संस्था को प्राप्त होता रहा है। यह संस्था और ग्रंथागार जनहित के साथ—साथ शोर्धािथयों को भी उपयोगी सिद्ध होते रहे हैं। वीर सेवा मन्दिर पुस्तकालय का अनेक भारतीय और विदेशी अनुसंधानकर्ता अपने अनुसंधान हेतु लाभ लेने आते रहते हैं। यहाँ आने वाले शोर्धािथयों के लिए संस्था में जाति समुदाय का भेदभाव किए बिना ठहरने और पढ़ने की नि:शुल्क व्यवस्था की जाती है। जैन साहित्य और इतिहास के सम्बन्धों में अन्वेषण करने वाली यह एक प्रमुख संस्था है।

पंडित जुगल किशोर जैन मुख्तार जी विशाल जैन साहित्य, जैन आचार्यों का इतिहास और बड़ी संख्या में शोध लेखकों के निर्माता थे। वह एक बोल्ड पत्रकार और निष्पक्ष और साहसी आलोचक और टिप्पणीकार थे। अपने पूरे जीवन में एक विचारक,पंडित जुगल किशोर जैन मुख्तार जी ने जैन अवधारणाओं की सार्वभौमिक स्थापना के लिए काम किया।
इन्होंने 91 साल की उम्र पूरी करने के बाद एटा में 22 दिसम्बर 1968 को देह का त्याग कर दिया ।

पंडित जुगल किशोर जैन मुख्तार जी “युगवीर” की चरण छतरी आज भी “वीर सेवा मंदिर” सरसावा में है।


पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पितृकुछ और गुरुकुछ । ७तभद्रेण ।” यदि पडितजीकी यह सूचना सत्य > हो तो इससे यह विषय ओर भी स्पष्ट हो जाता है कि रातिम समन्तभदका ही नाम था।वास्तवर्मं ऐसे ही महत्त्वपूर्ण काव्यप्रंथोंके द्वारा समन्तमद्रकी काब्यकीरति जगतमें विस्तारको प्राप्त हुई है | इस प्रंथमें आपने जो भपूर्व शब्दचातुर्यकोी लिये हुए निर्मे भक्तिगगा बहाई है उसके उपयुक्त पात्र भी आप ही हैं। आपसे भिन्न “ शातिवर्मी ” नामका>» पं० जिनदासकी हस सूचनाको देखकर हमने पतन्नद्वारा उनसे यह माद्म करना चाद्दा कि कणोटक देशसे मिली हुईं अध्सहललीकी वह कौनसी प्रति है: और कहाँके भंडारमें पाई जाती है जिसमें उक्त उल्लेख मिलता है । क्‍योंकि दौवलि जिनदास शात्रीके भडारसे मिली हुईं “ आप्तमीमासा 'के उलछेखसे यह उल्लेख कुछ भिन्न है। उत्तरमें आपने यही सूचित किया कि यह उल्लेख प० वंश्ी- घरजीकी लिखी हुईं अध्सहस्नीकी प्रस्तावना परसे लिया गया है, इस लिये इस विषयका प्रश्न उन्दींसे करना चाहिये । अष्टसहल्लीकी प्रस्तावना ( परिचय ) को देखने पर माछ्म हुआ कि उसमें “ इति ” से * समन्तभद्रेण ” तकका उक्त उल्लेख ज्योंका त्यों पाया जाता है, उसके शुरूमें “ कर्णोट्देशतो रूब्धपुस्तके ” और अन्तमें इत्यायुड्ेजो दृश्यते” ये शब्द लगे हुए हैं। इसपर गत ता० ११ ज़ुलाईको एक रजिष्टड पत्र प० वशीधरजीको शोलापुर मेजा गया और उनसे अपने उत्त उल्लेखका खुलासा करनेके लिये प्रार्थना की गईं | साथ ही यह भी लिखा गया कि “ यदि आपने स्वयं उस कणोठ देशसे मिली हुई पुस्तकको न देखा हो तो जिस आधार पर आपने उक्त उल्लेख किया है उसे ही कृपया सूचित कीजिये' । ३ री अगस्त सन्‌ १९२४ को दूसरा रिमाइण्डर पत्र भी दिया गया परंतु पडितजीने दोनोंमेंसे किसीका भी कोई उत्तर ठेने की कृपा नहीं की । और भी कहींसे इस उल्लेखका समर्थन नहीं मिला । ऐसी ছাভ यह उल्लेख कुछ संदिग्ध माल्म होता है। आश्रय नहीं जो जेनद्वितेषीमे प्रकाशित उक्त * आप्तमीमांसा 'के उल्लेलकी गलत स्मृति परसे ही यह उल्लेख कर दिया गया हो; क्योंकि उक्त प्रस्तावनामें ऐसे और भी कुछ गलत उल्लेख पाये जाते हैं-- जैसे 'काच्या नग्वाटको5ह ” नामक पयको मदिषेणप्रदास्तिका बतलाना, जिका वह पथ नहीं है ।




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