भगवान् महावीर : आधुनिक सन्दर्भ में | Bhagwaan Mahaveer : Aadhunik Sandarbh Mein

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Bhagwaan Mahaveer : Aadhunik  Sandarbh Mein by नरेन्द्र भानावत - Narendra Bhanawat

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ड ) तो यह है कि महावीर के तत्त्व-चिन्तन का महत्त्व उनके अपने समय की अपेक्षा आ्राज, वतं मान सन्दर्भ में कहीं अधिक सार्थक और प्रासंगिक लगने लगा है। वैज्ञानिक चिन्तन ने यद्यपि धर्म के नाम पर होने वाले वाह्य क्रियाकाण्डों, अत्याचारों और उन्मादकारी प्रवृत्तियों के विरुद्ध जनमानस को संघर्पशील बना 'दिया है, उसकी इन्द्रियों के विषय-सेवन के क्षेत्र का विस्तार कर दिया है, श्रौद्योगिकरण के माध्यम से उत्पादन की प्रक्रिया को तेज कर दिया है, राष्ट्रों की दूरी परस्पर कम करदी है, तथापि आज का मानव सुखी और शान्त नहीं है । उसकी मन की दूरियाँ वढ़ गई हैं। जातिवाद, रंगभेद, भुखमरी, ग्रुटपरस्ती जैसे सूक्ष्म संहारी कोटाणुओं से वह ग्रस्त है। वह अपने परिचितों के बीच रहकर भी अपरिचित है, अजनवी है, पराया है। मानसिक कु ठाञ्नों, वैयक्तिक पीड़ाओं और युग की कड़वाहट से वह तसस्‍्त है, संतप्त है। इसका मूल कारण है--श्रात्मगत मूल्यों के प्रति उसकी निष्ठा का अभाव । इस अभाव को वैज्ञानिक प्रगति और आध्यात्मिक स्फुरणा के सामंजस्य से ही दूर किया जा सकता है। आध्यात्मिक स्फुरणा की पहली शर्ते है-व्यक्ति के स्वतंत्रचेता अ्रस्तित्व की मान्यता, जिस पर भगवान्‌ महावीर ने सर्वाधिक वल दिया, श्रौर आज की विचारधारा भी व्यक्ति में वांछित मूल्यों की प्रतिष्ठा के लिए अनुकूल परिस्थिति-निर्माण पर विशेष वल देती है। आज सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर मानव-कल्याण के लिए नानाविध संस्थाएं ओर एजेन्सियां कार्यरत हैं। शहरी सम्पत्ति की सीमावन्दी, भूमि का सीलिय और आयकर- पद्धति आदि कुछ ऐसे कदम है जो श्राथिक विपमता को कम करने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं। धर्मनिरपेक्षता का सिद्धान्त भी, मूलतः इस बात पर बल देता है कि अपनी-प्रपनी भावना के अनुकूल प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी धर्म के अनुपालन की स्वतंत्रता है। ये परि- स्थितियां मानव-इतिहास में इस रूप मे इतनौ सावेजनीन वनकर पहले कभी नहीं आई ॥ प्रकारान्तर से भगवान्‌ महावीर का अ्रपरिग्रह व॒ अनेकान्त-सिद्धान्त ही इस चिन्तन के मूल में प्रेरक घटक रहा है। वत्तं मान परिस्थितियों ने श्रोष्यास्मिकता के विकास के लिए अश्रच्छा वातावरण तैयार कर दिया है । आज आवश्यकता इस बात की है कि भगवात्र्‌ महावीर के तत्त्व-चिन्तन का उपयोग समसामयिक जीवन की समस्याओं के समाधान के लिए भी प्रभावकारी तरीके से किया जाय । वर्तमान परिस्थितियां इतनी जटिल एवं भयावह वन गयी हैं कि व्यक्ति श्रपने आवेगों को रोक नहीं पाता और वह विवेकहीन होकर झात्मघात कर बैठता है। आत्म- हत्याओं के ये आंकड़े दिल-दहलाने वाले हैं। ऐसी परिस्थितियों से बचाव तभी हो सकता है जवकि व्यक्ति का हष्टिकोण आत्मोन्मुखी बने । इसके लिए श्रावश्यक है कि वह जड़ तत्त्व से परे, चेतने तत्तव को सत्ता में विश्वास कर यह्‌ चिन्तन करे कि मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हें, किससे बना हूँ, मुझे कहाँ जाना है । यह्‌ चिन्तन-क्रम उसके मानसिक तनाव फो कम करने के साथ-साथ उसमें आत्म-विश्वास, स्थिरता, धैर्य, एकाग्रता जैसे सदभावों का विकास करेगा ।




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