राज्यश्री | Rajya Shree

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Rajya Shree by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रथम अंक ध ` ^ देव-मंदिर में राज्यश्री दान के उपकरण और सिक्ठ उपस्थित हैं राब्य०--( मिछओं की वस्त्र ओर घन देती है--शांतिदेव सामने आता है )-तुम्हारा शुभ-नाम भिक्ु ९ शांतिदेव-- जय हो ! मेरा नाम शांतिभिह्लु, . ....... रुक कर राज्यश्री की ओर देखने लगता है राज्यश्री-मिक्षु, तुमने अवज्या प्रहण कर ली है, किन्तु तुम्हारा हृदय अभी.... ...... -* ' शांति० --कल्याणी ! में, मेरा अपराध-- राज्यश्री--हाँ तुम ! मिश्ु ! तुम्हें शील-सम्पदा नहीं मिली, जो सर्व-प्रथम मिलनी चाहिये 1 हे शांति-मैं सब ओर से दरिद्र हूँ देवि !--( स्वगत )--विश्व में इतनो विभूति १ और में--सिर ऊँचा करके अत्यंत उँचाई की ओर देखता हुआ केवल उलठा होकर गिर जाता हूँ--चढ़ने की कौन कहे ! राज्य०--क्या सोचते हो, सिद्लु ! शांति०--केवल अपनी क्षुद्रता-- राज्य०--तुम संयत करो अपने मन को भिक्लु ! श्लाघा और “ आकांक्षा का पथ तुम बहुत पहले छोड़ चुके हो । यदि तुम्दारी २१




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