गागर मैं सागर | Gagar Main Sagar

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Gagar Main Sagar by अज्ञात - Unknown

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about अज्ञात - Unknown

Add Infomation AboutUnknown

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
व्राह्मणकुमार बोले-हमें अच्छे खेत की पहचान है। तुमसे हमें कुछ जानना नहीं है । अच्छे पात्र तो ब्राह्मण ही हो सकते हैं, तम्दारे जैसे नहीं । चल, जा-जा, यहाँ तुम्हें कुछ मिलने का नहीं । यक्ष बोला--बआहाणकुमारो ! तुम जिन्हें पात्र कह रहे हो, वे सही अर्थ मे पात्र नहीं हैँ । क्रोध, हसा आदि प्रवृत्तियों मे आसक्तं रहने वाले कभी पात्र नहीं होते । व्राह्मणकुमार बोले--ओ भिक्षुक ! ब्राह्मणों को बुरा-मछा कहता है और भिक्षा भी लेना चाहता है, यह कैसी धृष्टता ! यह सब अन्न भले ही नष्ट हो जाए, फिर भी तुझे कुछ नहीं मिल सकता । यक्ष फिर बोला--जितेन्द्रिय साधु को भिक्षा नहीं दोगे तो तुम्हें यज्ञ का क्‍या लाभ होगा ? इस प्रकार यक्ष की विपक्ष, बातें सुन ब्राह्मणकुमार क्रोध से काँप उठे, मुनि को मारने के लिए दोड़े | यक्ष ने बीच में ही उन सबको मूच्छित कर दिया। कुमारो कौ यह दशा देख उपाध्याय दौड़े ओर मुनि के चरणों में गिर पडे । मुनि को शान्त करने के लिए बोले--अज्ञानी कुमारों ने आपका अविनग्र किया है, उन्हें क्षमा करें । आप महर्षि हैं-दया के सागर हैं। यक्ष मुनि के शरीर से दूर हो गया । मुनि अपनी शान्त-मुद्रा में बोले -मेरे न तो पहले क्रोध था और न अब भी है। यह काम मेरी. सेवा में रहने वाले यक्ष का है। ब्राह्मण बोले--आप क्रोध नहीं करते, हमें मालम है। हमारे यहाँ भोजन बना है, उसमें से कुछ भिक्षा ले हमें पवित्र करें। मुनि ने आहार ले मास-तपस्या का पारणा किया । ब्राह्मणों को अहिसात्मक यज्ञ का उपदेश दे, मुनि अपने स्थान को चले गए । ५ गागर में सागर „ ` ৪




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now