वस्तुविज्ञानसार | Vastuvigyanasaar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अनन्त पुरुषार्थं [ও स्वयं उपस्थित होते ही है। सर्वेशदेव ने अपने शान में यह देखा हे कि ২ बजे अमुक परमाणुझों की काली अवस्था होनी हैं, ओर यदि निमित्त का अभाव हने से भरथवा निमित्त के विलम्ब से आने कै कारण वह अबस्था विलम्ब सेहे तो सवैश का ज्ञान गलत ठहरेगा; किन्तु यह असभ्भव है | जिस समय वस्तु की जे कमबद्ध अवस्था होनी होती है, उस समय निमित्त उपस्थित न है| यह हा ही नहीं सकता। निमित्त हातात है किन्तु पद कुछ करता नहीं है। यहें। पुद्ल का दृष्टात दिया गया ह। इसी प्रकार अब जीव का टृष्टत देकर समझते है | किसी जीव के केवलश्ान प्रग८ होना हे। और शरीर से वज्व्रषमनाराचसहनन न हे ते केवलज्ञान रुक जायेगा, ऐसी मान्यता बिल्कुल मसत्य एवं पराधीन दृष्टि वाले की है | जीव केवलशान प्राप्त करने की तैयारी भ हे। और शरीर में वज्बृषभनाराचसेहनन न हो ऐसा कदापि नहीं ह सकता । जर उपादान स्वय मन्नद्ठ हे वृह निमित्त स्वय उपस्थित हाता ही है। जिम समय उपादान कायं रूप में परिणत हाता हँ उमी ममय दूसरी वस्तु निमिन्त रूप उपस्थित होती है। निमित्त बाद में आता हा से बात नहीं है। जिस समय उपादान का काथ हेता हे उसी समय निमित्त की उपस्थिति भी ह्वाती है, ऐसा होने पर भी निमित्त--उपादान के काथ मे किसी भी प्रकार की महायना, श्रसर प्रभाव अथवा परिवतेन नहीं करता। यह नहीं हा सकता कि निमित्त न हो । ओर निमित्त से काये हो ऐसा भी नहीं दे सकता | चतन मथवा जड द्रव्य में उसकी अपनी जे क्रमबद्ध मवस्था जब हेनी होती हं तब झनुकूल निमित्त उपस्थित हेते हैं | ऐसा जे स्वाधीन द्रष्टि का विषय है उसे संम्यश्टष्टि ही जानता टे, मिथ्याृष्िये। के वस्तु की स्वतत्रना की प्रतीनि नी हानी, इसलिये उनकी प्रष्टि निमित्त पर जाती टे। भरहानी का वस्तुस्वरूप का यथां ज्ञान नही है, इसलिये बम्तु बी कसबद्ध पर्याय में शका करता है कि यह ऐसा कैसे हे! गया! उसे सरवह्यके शान की झोर पस्तु की स्वतत्रता की श्रतीति नहीं है, ज्ञानी के वस्तुस्वरूप




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