हस्त लिखित हिन्दी ग्रंथो का पन्द्रहवां त्रैवार्षिक विवरण | Hast Likhit Hindi Grantho ka 15th Traivarshik Vivran

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Hast Likhit Hindi Granh by Pandulipi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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हू अर डे इससे विदित होता है कि उदयपुर के राजा हिंदूपति वी. जगलसिंह को सता जंबवती के प्रधान, अभिनव प्रभाकुमार के मंत्री हंसराज के बंप के पुल के सुत ने आग्रह करके संचत्‌ १७०७ फे सब्र की पूर्णिमा शनिवार को यह अंधे बनवाया 1 अंधकार ने अपना नाम कहीं. उब्घोदय ( रून्घोदय फे भादसीरे हाल रसिक सुखकार और कहीं ( ठाखूचंद कहे सभलों मनोगेरे ) लिखा है 1 पंथ कार. है; क्योंकि अंथारंभ में उसने जिन की बंदना की ऐ । एक छालंद जन ने 'राजुल परचीसों' नामक अंध छिखा है ( दे० खो० बि० दिल्‍ली सं० ५४ ) | किंतु उसमें सन/संघत नहीं है । ने ही एक नामक मंथ सं० १७३६ पि (१६०५ है ते मरे बनवाया है ( दे० खो० वि० १६०२ सं० ७६ ) । बहा ये जैनघर्म के खरतरगरढ़ के नायक जिनचंद्र सूरि के सेवक सोभाग सूरि के शिष्य लालचंद बताएं गए हैं और उस साध कॉ रचना बीकानेर में महाराज करणसिंह जी के बेटे अनुपसिंह जी के राउध में कोडारी नेणसी के अंगज ( पुत्र ) जयतसी के कहने से हुई है | संभव है. उपयुक्त दोनों अंधों के रचयिता एक ही हों । एक लालचंद ने ( दे? खो० वि० १५१००१४९ खत 61, है नाभि कुंवर की आरती', चरांग चरिन्न सपा ( र० कार विस सन दर या हल १७७० ) और “जयमाला' ( दे खो० बि० १९९६०२८ सं० २६० बनाएं, कल हने उसी का लेखक लाऊचंद प्रस्तुत ग्रंथकार से भिन्न है । शुसफी र्थनाएं जडारहवी सतादिए को हैं | प्रस्तुत ग्रंथ का कथानक यद्यपि जायसी के 'पद्माचत' के कधानक के हैं, परंतु कही कहीं घटना-चक्र में अंतर है । इस अंथ का लिपिकाल संत १५४ वित १०० ई० है । हित अथवा चाचा बज के प्रतिभाशाली कवियों में हैं । इनकी रचना परिमाण में भी अधिक है । यह राघावलभ संप्रदाय के थे और हरिवंशजी के शिष्य थे । इनके कुछ ग्रंथ सन्‌ १९०६-०८ के खोज विवरण के संत २२४ में आ चुके हैं। इस विवरण में इनके रचे १६ अ्रंथों के घिवरगा सम्मिलित हैं जो परिसाण में प्रायः दस सदस्र श्ठोकों के बराबर हैं । उनका “वाणी' नामक पंथ पूरे ८ चर्ष के पंत नस से पूर्ण हुआ था । सं० १८१२ १७५५ हू० में आरंभ होकर सन, १८२५ स् १७६३४ वह समाप्त हुआ । उनके रचे समस्त म्रंथों के नाम, (१) उपये बक्ति, (२) मंगर, ( ३ ) होरी घमार; (४ ) पद, ( ५ ) पद, ( ६ ) (७) पदसजाह, (८ ) पदावलों ( ९) पदावली (1१० ) फ्यावली ( ११ 0) के कॉकिश, (१२ ) रसिक अनन्य प्रचावली, (१३) समाज के पद, ( १४ जे बिक स्वक्षनप दि, (1५ ) संतों की वाणी तथा (1६) वाणी हैं । इनमें से 1 सं० वि० न १७५३ ई० का और सं० ११ सं० १८१२ ८ १७७७५ दूं का तथा संग १५ सन सं 9७५५-६३ ० का बना हुआ है सौर सं २ और ६ के लिपिकाल कम से १०६८ तथा १८२९ ० हैं । सेप में सन्‌-संवत्‌ का उल्लेख नहीं है । सं० ३, ४, ५५ ६, 9, ८; ९५१० और १३ सदर्वपूर्ण हैं । सं० १२ उपयोगी है । इसमें नाभा जी के भक्तमाल के सइश अनेक भक्तों के नाम और प रिचिय छप्पयों में दिए गए हैं । इसमें पद




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