सचित्र शुद्धबोध | Sachitra Shuddhabodh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( उ ) ভিন 1 वाचकवृन्द इस बात को नहीं जानते हैं कि इस चरितात्मक पुस्तक के प्रकाशन में ही हमको किन असुविधाओं का सामना करना पड़ा है । आयेसमाज में संस्कृत के उदच्चकोटि के संमान्य, संभ्रान्त विद्वान के चरित्र को लिखने व प्रकाशन करने का प्रथम ही प्रयत्न हे । यह वात अत्यन्त दुःख से लिखी जायगी कि आयसमाज में उन उन विषयों के निष्णात पारद्भत परिडतों की प्रतिदिन न्यूनता ही होती जा रही है । आयेजगत्‌ में जो भी पस्डित हुआ अपने जैसा अकेला ही हुआ , उसके दिवंगत हो जाने के पश्चात्‌ उसके रिक्त म्थान को लेकर काय निभानेवाला कोई नहीं हुआ | स्वर्गीय १०८ श्री स्वामी शुद्धबोधतीथ जी अपने दंग के अद्वितीय विद्ध भरे | महाभाष्य जेसे शआआकर-प्रन्थ को हस्तामलकवत्‌ पदति थे । व्याकरणशाख (नव्य व प्राचीन, दोनों) को अधिकारग्रयुक्त वाणी से पढ़ाते थे । यद्यपि आपकी प्रसिद्धि व्याकरणशासत्र के कारण थी तथापि न्याय, वैरोषिक, सांख्य, योग, वदान्त के भन्थोँको बड़े चाव से पढ़ाते थे। ऐसे दिग्गज पण्डित का स्थान न जाने कब तक खाली पड़ा रहेगा ? आप प्राचीन ढंग के परिडत थे और आप की अप्रतिम विद्गत्ता की सनातनी पौराणिक पण्डितों में भी धाक थी । श्री स्वामी जी की प्रबल इच्छा थी कि आयेसमाज में पट्शाम्नों व वेदों के विद्वानों की संख्या सहस्नों तक पहुँच कर उसका गौरव सवंत्र प्रसारित हो ।




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