देखा, सोचा, समझा | Dekha, Socha, Samjha

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सेवाग्राम के दशंन | १५ हुआ कि सेवाग्राम में बाहिरि से आने वाले व्यक्तियों के लिए भोजन की दुकान या होटल की कोई व्यवस्था नहीं हैं इसलिये स्टेशन के रिफ्रेशमेंट रूम में मिसिर 'केलनर एण्ड स्पेन्सर' का प्रसाद पने के लिए जाना पड़ा। गांधी जी से मुलाकात का समय निश्चित हुआ था, संध्या, चार बजे परन्तु हम लोग सेवाग्राम जा पहुचे लगभग दोही बजे । आखिर करते भी क्या “? वर्धासे गांधीजी के आश्रम तक डिस्ट्िक्टबोडं ने सडक बनवादीहं। आश्रम के लिये जगह चुनने में प्राकृतिक सौन्दयं का किस दृष्टिकोण से विचार किया गया है, कहना कठिन है । सुदूर क्षितिज परर पठार के टीलों की अस्पष्ट रेखा ज़रूर दिखाई देती है और कुछ नहीं था । लम्बे-चौडे, धूप से तपते हुये मैदान में दो-तीन वक्ष हैं । कुटिया मामूली तौर पर फूस की है । गांधी जी की कुटिया और आश्रम के हस्पताल की दीवारें अलबत्ता मिट्टी की हैं। गांधी जी की कुटिया की छत अच्छी मोटी-भारी और मजबत है । शेष कुटियां उसी हैं कि अच्छी जोरदार आँधी चलने पर उनके फूस का भी पता चलना कठिन होगा । आश्रम कुछ सूना सा जान पड़ा | शायद बहुत से लोग सत्याग्रह में जेल चले गये हें । आश्रम के मैनेजर का पता पूछा । मैनेजर श्री शाह एक कुटिया मे लेटे हुये थे। कुटिया में खाट ज़रूर थी परन्तु खाट बान से न बुन कर उस पर तरुते डाल दिये गये थे। तख्तों पर बिछ खटहूर के बिस्तर पर शाह साहब उस्तरे से घुटे हुये सिर पर भीगा तौलिया रखे दुपहर की नींद ले रहे थे । उनकी निद्रा भंग करने की हिसा के सिवा उपाय न था, सो करना ही पड़ा। प्राथना की कि आश्रम को देखना और उसके विषय में कुछ जानना चाहते हैं । “देख लीजिले ।” शाह साहब ने लेटे ही उत्तर दे दिया । फिर विनय की कि देखने से मतलब फूस की भोपड़ियाँ देख लेने से नहीं हैं । ऐसी कोपडियां तो अनेक अवसरों पर देखी हं । प्रयोजन हं, उस विचार- धारा को जानने का जिसके कारण आप लोग यह्‌ कष्टमय जीवन बताना उचित समभते हें । “हमें तो इसमे कोई कष्ट जान नहीं पड़ता ?” शाह साहब ने लेटे ही लेटे उत्तर दिया । “परन्तु आपका तरीका असाधारण हैँ | यह भी नहीं कि आप आराम से रह न सकते हों ?”




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