धर्मं के दशलक्षण | Dharma Ke Dashlakshan

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Dharma Ke Dashlakshan by डॉ. हुकमचन्द भारिल्ल - Dr. Hukamchand Bharill

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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दशलक्षण महापवं [1 १३ अत: आज भी इन धर्मो को आराबना को पूरी-पूरी आवश्यकता है तथा सुदूरवर्ती भविष्य में भी क्रोधादि विकारों से युक्त दुखी आत्माएँ रहने वाली हैं, ग्रत: भविष्य में भी इनकी उपयोगिता असंदिग्ध है । तीनलोक में सत्र ही क्रोधादि दुःख के और क्षमादि सुख के कारण हैं । यही कारण है कि यह महापर्व शाश्वत अर्थात्‌ जेकालिक और सार्वभौमिक है, सव का है। भले ही सव इसकी आराधना न करें, पर यह अपनी प्रकृति के कारण सव का है, सब का था, और सब का रहेगा । यद्यपि अष्टाक्लिका महापवे के समान यह भी वर्ष में तीन वार आता है - (१) भादों सुदी ४५ से १४ तक, (२) माघ सुदी ५ से १४ तक, व (३) चैत्र सुदी ४ से १४ तक; तथापि सारे देश में विशालरूप में बड़े उत्साह के साथ मात्र भादों सुदी ५ से १४ तक ही मनाया जाता है । बाकी दो को तो बहुत से जेन लोग भी जानते तक नहीं हैं। प्राचीन काल में बरसात के दिनों में ग्रावागमन की सुविधाओं के पर्याप्त न होने से व्यापारादि कार्य सहज ही कम हो जाते थे | तथा जीवों की उत्पत्ति भी वरसात में बहुत होती है। अहिसक समाज होने से जैनियों के साधुगण तो चार माह तक गाँव से गाँव भ्रमर बंद कर एक स्थान पर ही रहते हैं, श्रावक भी वहुत कम भ्रमण करते थे। अतः सहज ही सत्समागम एवं समय की सहज उपलब्धि ही विशेष कारण प्रतीत होते हैं - भादों में ही इसके विशाल पैमाने पर मनाये जाने के । वैसे तो प्रत्येक घार्मिकपवं का प्रयोजन आत्मा में वीतराग भाव की वृद्धि करने का ही होता है, किन्तु इस पर्व का संबंध विशेष रूप से आत्म-गुणों की आराधना से है। अतः यह वीतरागी पतं संयम और साधना का पर्व है। पव श्रर्थात्‌ मंगल काल, पवित्र अवसर | वास्तव में तो अपने आत्म-स्वभाव की प्रत्तीतिपुवक वीतरागी दशा का प्रगट होना ही यथार्थ पर्व है, क्योंकि वही आत्मा का मंगलकारी है और पवित्र अवसर है। वर्म तो आत्मा में प्रकट होता है, तिथि में नहीं; किन्तु जिस तिथि में आत्मा में क्षमादिरूप वीतरागी शान्ति प्रकट हो, वही तिथि पवे कही जाने लगती है । धर्म का आधार तिथि नहीं, आत्मा है ।




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