श्रीमद् वाल्मीकीय रामायण भाग - २ | Srimad Balmikiya Ramayan -part-ii

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
श्रेणी : ,
शेयर जरूर करें
Srimad Balmikiya Ramayan -part-ii by महर्षि वाल्मीकि - Maharshi valmiki

एक विचार :

एक विचार :

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

महर्षि वाल्मीकि - Maharshi valmiki के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है | जानकारी जोड़ें |

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(देखने के लिए क्लिक करें | click to expand)
ट्बट ना लयरसत बिच्यल कनिगाल लिन कक की अल कक कक कि बेहद बढ़ा लिया और अपनी दोनों भरुजाओं तथा चर्णोंसे उस पढ॑तकों दबाया | ११ 1 स॒चचालायलश्धाथु मुझ कपिपीडिंत । तरूगा पुष्चिलाधाणा सब पुष्यमदातयत्‌ ॥ १२१ कप्चर हमुमानजीके द्वारा दबाये जानेपर तुरत दी वह पवत कॉप उठा और दा घड़ीतक डगमगाता रहा । उसके ऊपर लो वृक्ष उगे थे उनकी डाछियोके अग्रमाग फूर्कोति छदे हुए थे किंतु उस पर्तके हिलनेसे उनके से सारे फूल झ गये ॥ १२ । लेन पाइपसुक्तेन पुष्यधिण खुगन्धिना । सर्चतः सबूत शेर बभी पुष्यमयों यथा ॥ रै३॥ कूथोसि कड़ी हुई उस सुसन्निति पुष्पराशिकें द्वारा सब आओरसे आ्कादित हुआ वह परत ऐसा जान पढ़ता था मानों कह फूंका ही शना दुआ दो ४ १३ ॥ लेन सचोसमबीयण पीडथमारः स पंत । सलिक सम्परह्ुझाव मदमत्त इव द्िपः ॥ र४॥ महापराकमी इनुमानजीके धारा दमाया जाता दुँस्मा गजराज अपने कुम्मस्थलसे मदकी वारा बहां रद हो १४1) पीड धमानस्तु बलिना मदेन्द्रस्तेन पर्थत । रीतीनिवलेयामास... काजनांजनराजती ॥ १५ ॥ बलवान पवनकुमारकें भारसे दवा डुझा मडेन्द्रगिरि सुनहरे रुपदक्ते और काछे रंगके जल्लोत प्रवाहित करने लगा ॥ १५ | मुमोस ख दिखा दोल्मे विधाला समन दिखाग मध्यमेसाचिया जुप्टो धूमराजीरिदानक ॥ र६॥ इतना दी नहीं जेंसे मध्यम ज्वाछासे युक्त अस्नि छगातार घुआँ छोड़ रदी दो उसी प्रकार व पर्वत मैनसिंख- सहित बढ़ी-बढ़ी शिवाएँ गिराने लगा ॥ १६ ॥ इर्जिा पीश्पमानेन पीस्यमानानि खलेतः । गुदाबिशानि सत्वानि चिनेदुर्विकले स्वरे ॥ १७४ इमुमानजीके उस पदत-पीडनसे पीड़ित होकर बोंके समझा चीव शुफागिं घुस गये और बुरी तरइसे खिस्स्ते सो ४ १७ ॥ स बदन सत्यसंभार दोकपीशोनिमिसलः । गृचियों पूरयामास दिशश्योफबनानि ख ॥ १८1 इस प्रकार पक॑तकों दबनिके कारण उत्पस्न हुआ बह जीक्जन्तुओंका मदन कोल्मइक एव्वी उपपस और शन्यू् दिवाल्केंमि मर भव प्र १८ ॥ बदन प्विदत वत शिसोभधि पूथुमिनागा व्यक्तसस्तिकरुसणें । चमम्त पाचक घार ददशुदेशने दिला ॥ १९ 8 जिनमें स्वस्विंक चिट स्एश्ट टिस्वायी दे रहे थे उम स्थूल फर्णोंसे विषकी मयानर आग उगलते हुए दहे-बढ़े सर्प उस पर्वतकी शिकाओको अपने दौंतोसि डंसने छगे ९ ९॥ तास्तदा सबिवेदंा कुपितैस्तेमंदराशिलाः । जज्यलु पावकोददीप्ता विभिवुश्य सइस्धा ॥ २० ह कोभसे भरे हुए उन विषेठि सॉंपोंकि काटमेपर में बढ़ी बड़ी शिलाएँ इस प्रकार जरू उठीं मानी उनमे मास छू सयी हो । उस समय उन सबके सइसों टकड़े हो गंगे ही श+ ॥ यानि लब्मिजातामि पते | विपष्नान्यपि चागाना ने शोक शमितु चिपम # २१ ॥ उस पकतपर जो बहुतनसी ोषधियों उगी हुई थीं वे दिषकों नष्ट करनेवाकी दोनेयर भी उन नाेकि विषकों दान्त न कर सकी ॥ २१ ॥ मिचलेड्य गिरिश्ूतिरिति मत्वा तपशिन । जस्ता विद्याभरास्तस्थादुत्पेतु कीगणेः सश ॥ २९ ॥ उस समय वहाँ रदनेवाकि तफसी और सिंधाधरोनि समझा कि इस पफ्बंतकों सूतकेग ताड़ रे हैं इससे मवभीत दोकर वे अपनी झ्ि्योकि साथ बहीँसे ऊपर उठकर अल्तर्क्षिमें चले गये | र९ | पानभूमिगत दिस्वा.. दैममासवभाजनम । पाभाणि थे सददादाणि करकांक्ा दिरच्मयान ॥ रदे ॥ छेशायुश्नावसान भश्यान माखानि विधिधानि थे । जार्षभाणि थ उ्माणि खड़ाश् कनकत्सरून ४ २४ ॥ छतकष्ठगुणा कीवा रक्तमास्यालुलेपनाः | रकाका पुष्कराहाएर गगन अतिपेदिरे # ५५ ४ मदुपानके स्थानमें सके डुए सुवर्णमय आसवपान् बहुमूल्य बन सोनेके कलश भाँति मौंतिके भदय पदार्थ) सटनी नाना मकारके फर्लेके गुदे बेलॉकी स्ांखकी बनी हुई ढाढें और सुवर्भजटित मूठवाली तल्वारें छोड़कर कम्ठमे माला भारण किये छाल रंगके फूल और अनुलेपन (चन्दन ) ख्त्ाये मफुल्ठ कमंल्के ठहर सुन्दर एवं लाल मेत्रवलि ये मतदाके. विदाधय्गण मयभीतस देकर. आकाश खके गये ॥ र३े-रे९ ॥ दारदूपुरकेयूरपारिदायघरा खियः | बिसिता। सख्मितास्तस्थुराकादो रमनेः लू ॥ २९ ॥ उनकी छियोँ गढेमें दर पैरेंमिं नूपुर शुजामोंमि बाजुलंद और कलाइयेमिं कंगन धारण किये आकाशर्म ₹ सॉपके फेंग दिखाकी देंनेशाओी बीक रेकाकों सवसिक काइदे हैं




User Reviews

अभी इस पुस्तक का कोई भी Review उपलब्ध नहीं है | कृपया अपना Review दें |

अपना Review देने के लिए लॉग इन करें |
आप फेसबुक, गूगल प्लस अथवा ट्विटर के साथ लॉग इन कर सकते हैं | लॉग इन करने के लिए निम्न में से किसी भी आइकॉन पर क्लिक करें :