ग़दर का इतिहास | Gadar Ka Itihas

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Gadar Ka Itihas by पण्डित शिवनारायण दिवेदी - Pandit Shivnarayan Divedi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पहला भष्याय थ््ह्छ नानासाइबकों देनेके छिये तैयांर थें। कहा जाता है दि यात्रा करते हुए जब नानासाहन ठखनऊ पहुंचे तब वहांके राजकर्चारियोंने उनपर हर तरदसे विश्वास-श्वापन किया | पर जब नानासाइबन चहांसे एकाएक चले जाये तब सर ज्ञान लारेंसके चिचमें सब्देह छुआ |. इसी कारण उन्होंने द्ानपुरके प्रधान सेनापतिकों शी सावधान होनेके लिये लिखा । हेनरी छार्सिव्मी विलकषण बुद्धिकी जितनी प्रशंसा की जाद वह बस है । # जो कुछ हो कानपुरके कलेक्टर नानासाहइबके गुणों विश्वासी थे ।. बाजीराव रुवर्गवासी होनेके बादू- से नानासाइबने किसी प्रकारके अधिश्वासका परिचय नहीं दिया था। लाडं डलहौजीकी संकीणं नीतिसे उन्हें सामिंक दुख हुआ था पर उनका खयाल यहीं था कि समय पाकर उत्रेज्ोॉंकी यह नीति बदल जायगी । वे समकते थे कि जिन्हें वे खुश करनेकी कोशिश कार रहे हैं थे एव दिन खुश दोंगे और एक न एक दिन उनकी पऐ शन फिर जारी होगी यही सीकर वे निश्चिन्त गौर सन्तुष्ट थे । यदि अजीमुल्ठादी कौतूदलभरी यूरोपकी बातोंसे सुग्घ न होते या अपने बचपनके सित्नोंकी मंत्रणामं न आते तो संभव था दि वे अपने गौरव- नस शूट न होते । कानपुर थी उंत्रे ज़ोंकि खुनसे ना रंगा जातों | व्हानछुरदरी गंगा भी असहाय खियों और निर्फ्ताथ बालकोंके खून कलुषित न होती । _.. ऊ दफेणिप फिफ्तिमोल्ड का एपकर हि. 32... न




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