पूज्य गुरु | Pujya Guru

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Pujya Guru by गंगानाथ झा - Ganganath Jha

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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डे प्रथम सापान जल जन >ललस जी ड ल्‍ज सन्‍+ लसजनललीसलजण अन्‍कत | चहुपा छोदे २ वाय्यो के सुसम्पद् समूह होते हैं) पस्तुत पाज्य दी भाषा का आधार है। वाक्य शब्दों का समूह होता है। भ्रत्येक शद में कई वर्ण होते हैं जिनफे अत्तर भी कहते हैं। * घत्तर' शज का घर्थ है अधिनाणी--जिसका कभी नाश न हा।। पर्ण को यह नाम इसलिए दिया जाता है, क्योकि प्रत्येक नाद्‌ ( ४००७ ) अविन/»्यर है। यदि किसी श- का उद्यारण करें तो उसके श्रत्तर उच्चारण काल मे ' नाद ' कदलाधेंगे ओर उस दशा में श-द नादों का समूह होगा। सृष्टि मे इन नादो का सण॒ठार ध्यनन्त है। प्रत्येक भाषा एक परिमित सख्या में ही नादो का धयेग करती है.। उदा दरणार्थ, चोनी भाषा में चहुत से ऐसे नाद हैं. जे! सस्द्त भाषा में नहीं, सस्क्तत मे कई ऐसे हैं जे! फारसी, श्रेंगरेजी आदि में नहीं |, ३-सस्कृत भाषा पें--जिन अत्तरो का उपयेग हेता हे वे येहे - 4 इंड खाल “डंस्थ ( साढे) ए ऐ ओचओ “मिश्रविद्तत दीध | (२ ९ (णाएण्प्रात आाईऊकाू +-दीध॑ ( सादे ) के सर ग घर उड़ --कवर्ग (कु) च ले ज्ञ रू झा --च्ग (थु) रे ठ ड ठदू शा --व्वर्ग (छु) सरल पाप + पाणिति ने इन्हों अच्सों के इस क्रम में माँधा है --




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