श्री मद वाल्मिकी रामायण भाग 1 | Shrimadvalmikiya Ramayan Vol. - I (balkand Se Kishkindhakand Tak)

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१७६ हु थीमबतात्मीकीररामामणे स<७५ ६९२५/२१४३ांड १ | 0फ३/६९४७०/६१५५/६९७॥८१३०/४+७३ढ कर / 5४ ५५१०५/२०फ१/<रकरीफ ९०८ फल फटीफेप ९टियक लीक रीक९ १३१ टटीक१ बी ३: /टरीकर >रे न री /टाकन «की कत>उक१;दी कन उटी पल लटीकर_थ कद हटीए २ रन जिससे त्रिपुरका नाश हुआ था; वह वही धनुष था; जिसे घुमने तोढ़ छाछा है ॥ १२ ॥ दूँ द्वितीय दुर्भप विष्णोर्तं खुरोत्तमेः तदिदं बेष्णब॑ राम घन) परपुरंजयम्‌ ॥.१३॥ (और दूसरा दुर्धप घनुप यह दे। जो मेरे हाथमें है । इसे मेष्ठ पेवतामोंनि भगवान्‌ विष्णुको दिमा था। श्रीराम | शत्रुनगरी- पर मिजय पानेवाछा पट्टी यह धेष्गण चनुप दे ।॥ १३ ॥ जमानसार फाऊुत्स्थ रौद्रेण घनुपा त्विदम । तदा तु देवताःसबोःपृ८छच्ति सम पितामहम ॥ १७॥ शितिकण्ठस्थ विष्णोश्व घलापलनिरयीक्षया । नऊकुत्थनन्दन | यह भी शिवजीके धनुपके समान ही प्रवछ है। उन दिनों समस्त देवताओंने भगवान्‌ शिव और विष्णुके बलाबलकी परीक्षाके लिये पितामह ब्क्षाजीते पूछा था कि इन दोनों देवताओंमं कोन अधिक बलशाली है? | अभिप्राय छु विशाय देवतानां पितामहः ॥ १५॥ निरोधं जवयामास तयोः सत्यचतां घरः। 'ेबताओकि एस अभिप्रागकी जानकर सत्यवादियोंमें भेषड पितामह ब्रह्माजीने उन दोनों देवताओं ( शिव और विष्णु ) में विरोध उत्पन्त कर दिया ॥ १५८३ ॥ विरोधे तु मद॒दू युद्धमभवद्‌ रोमहपणम्‌॥ १६॥ शितिकण्ठस्यविष्णोश्व परस्परजयेषिणोः । “विरोध पैदा होनेपर एक-दूसरेकी जीतनेकी इच्छावाले क्षिव और बिण्णुमें बढ़ा भारी युद्ध हुआ; जो रोंगटे खड़े कर देनेवाला था ॥ १६३ ॥ तदा ठु जास्मत शंच धनुभामपराक्रमम्‌ ॥ १७॥ हुंकारेण महादेवः स्तस्थितोष्ध त्रिलोचनः “उस समय भगवान्‌ विष्णुने हुझ्लार्मात्रसे शिवजीके भयंकर बलशाली घनुपकी शिथिल तथा तिनेत्रधारी महादेवजी- को भी स्तम्मित कर दिया ॥ १७३ ॥ देवेस्तदा समागस्य सर्पिसद्वेः सचारणेंः ॥ १८॥ याचिती प्रशर्म ठन्न जम्मतुस्तो सुरोत्तमी | सब ऋषिसमूहों तथा चारणोंसहित देवताओंने आकर उन दोनों श्रेष्ठ देवताओँसे शान्तिके लिये याचना की; फिर वे दोनों वहाँ शान्त हो गये ॥ १८६ ॥ जअम्भितं तदू घतुद छा शर्व विष्णुपराक्रमेः ॥ १९ ॥ अधिक मेनिरे विष्णु देवाः सपिगणास्तथा | “भगवान्‌ विष्णुके पराक्रमसे शिवजीके उस धनुषकों शिथिल हुआ देख ऋषियोंसद्वित देवतानि भगवान्‌ विष्णुको श्रेष्ठ माना ॥ १९३ ॥ घनू दद्गस्तु संकुद्धों विदेदेधु सद्दायशाः ॥२०॥ देवरातस्य राजपेंददी इस्ते ससायकम। सदनन्तर क्रुपित हुए मद्दायशस्वी रुद्रने वाणसहित अपना घनुष विदेशदेशके राजर्पि देवरातके द्वाथ्मे दे दिया ॥ इदूं. च् बेष्णयं राम घन्ः परपुरंजयम्‌ ॥२१॥ फऋतचीके भार्ग वे प्रादाद्‌ विष्णु/स न्‍्यासमुत्तमम। थ्रीसम | शाघुनगरीपर विलय पानेबाछे इस वेणाव- भनुषकी मगवास्‌ मिष्णुने शुगुदंशी ऋचीकमुनिकों उत्तम धरोहरफे रूपमें दिमा था॥ २१३ ॥ ऋचीकस्तु महातेजाः पुत्रस्याप्रतिकर्मणः ॥ २२॥ पितुरमंम बदी दिव्य जमदस्नेमंहात्मनः । (फिर महातेजखी ऋचीकने प्रतीकार ( प्रतिशोध ) की मावनासे रहित अपने पुत्र एवं मेरे पिता महात्मा जमदमिके अधिकारमें यह दिव्य धनुष दे दिया ॥ २२६ ॥ न्यस्तशरस्त्रे पितरि मे तपोय्छसमन्विते ॥ २३॥ अजजुनो विद्घे झृत्युं प्राकृतां चुद्धिमास्थित (तपोवलसे सम्पन्न मेरे पिता जमदग्नि अल्न्‍शर्ोका इरित्याग फरके जब ध्यानस्थ होकर बैठे ये, उस समय प्राइत बुद्धिका आश्रय लेनेवाले कृतवीर्यकुमार अजुनने उनको मार डाला ॥ २१२६ ॥ ' चधम्रप्रतिरुष तु॒पिठुः श्र॒त्था खुदारुणम्‌ । क्षत्रम॒ुत्साद्य॑ रोपाज्ञात॑ जातमनेकशः ॥ २४॥ (पिताके इस अत्यन्त मयंकर बधका, जो उनके योग नहीं था; समाचार सुनकर मैंने रोपपूर्वक वारंबार उतत्न हुए क्षत्रियोका अनेक वार संहार किया ॥ २४ ॥ पृथिवीं चाखिलां प्राप्प कश्यपाय महातने। यश्स्यान्तेडद्‌दूं राम दृक्षिणां पुण्यक्रमणे ॥ २५॥ श्रीराम | फिर सारी पृथ्वीपर अधिकार करके मेने एक यश किया और उस यशके समाप्त होनेपर पुण्यकर्मा महात्मा कश्यपको दक्षिणारूपसे यह सारी पृथ्वी दे डाली ॥ २५ ॥ द्त्वा महेन्द्रनिल्यस्तपोचलूसमन्वितः । श्रुत्या तु धनुषों भेद ततोडह॑ द्रुतमागतः ॥ २६॥ ध्ृष्चीका दान करके महेन्द्रपर्व॑ंतपर रहने लगा और वहाँ तपस्या करके तपोबलसे सम्पन्न हुआ। वहाँसे शिवजीके धनुषके तोढ़े जानेका समाचार सुनकर में शीमतापूर्वक यई। आया हूं ॥ २६ ॥ तदेव॑ वेष्णव॑ राम पितृपेतामर्ह मधत्‌। क्षत्रध्स पुरस्कृत्य शद्धीष्ष धमुरुत्तमम्‌ ॥ २७ ॥ योजयस्व ध्ञश््रेप्ठे शरं परपुरंजयम्‌॥ “* यदि शक्तो5सि काकुत्स्थ इन्हे दास्यामि ते ततशा २८॥ थऔीराम | इस प्रकार वह महान वैष्णवधनुष मेरे पिता पितामदोंके अधिकारमें रहता चला आया है; अब दुम क्षियभर्की




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