मयूर पंख | Mayur Pankh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भूमिका ई में ध्रत पुरों वी परम्परा होती ता तुम्दार चरणा पर मन जान कठिने हूय सर्मा्धित हात | ( चरित्र षा प्रवण) चरित्र ( श्राति हो ) हय समपण को वात्र वसी? नहँ मग्राया कि हुदय-समपण हुआ । वाह । यहः श्रव्छा सोमाग्य है ? नक्नि यह सोमाग्य हु या सयाग ? डेली दाना 1 व्यरिज्र मापा रानी ? तुम वया समकता हा भाषा सोमाग्य का सयाम झयवा समाग का सौमाग्य ! चरित्र ठोक है मुकमें इतना शक्ति है कि मैं सौभाग्य का सयाग बना लेता हू श्रौर सयाग॑ को सौमाग्य ! ( देखकर ) हाँ ! वावा कही हें? भाषा भोतर वश मूपा ठाक करन गए हूं । व्यरितव भरयनीया दिसी श्रोर की ? शैली भ्य इन भ्ररस्था में व किसको यश मूंपा ठाक वरेंग 1 भाषा शतां वहिन | व्यग्प न बरो । यरि तुम्हारा वश मूपा ठोव ने हाती ता व मुक श्रात्ा दत दि मे तुम्हारी वश मूपा ठाव करू । वहतो तरे महोन्यश्रा रहं ध्सलिए रटो समझा हि. जखब सह्य ने समक्ष उन्हें श्वन्पवस्थित नहीं रतना चाहिए 1 रियर भच्छा वया ससक महातय धा रहे हू रीली दह वविमी भा समय यं भ्रा गक्तं ह्‌ । चरिय मा सतत हु है तव मुझ यहीं नस रहना चादिएं । सुक्के उनसे वहा हर नगता हू। उताए जिय कामके पिए मुम भेजा था बह तो हुमा ही मरीं नरव्नि डर के साय उनने प्रठि श्रद्धा भी उमड़ पाती हू 1 थे जीवन में इतन गदर उनरते है




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