समयसार का कलश | Samayasa Ka Kalash

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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[२४ ) पालजी और ५ धर्मदातजी । इनमे प० रूपचन्दजी और भैया भगवतीदासजी का नाम विशेषरूपसे उल्लेखनीय है ! स्पष्ट है कि इन पॉचो विद्वानोने कविवर वनारसीदासजी के साथ मिलकर कविवर राजमल्लजोी की समयसार कलश बालवोध टीकाका अनेक वार स्वाध्याय किया होगा । यह टीका अध्यात्मके प्रचारमे काफी सहायक हुई यह इसीसे स्पष्ट है। प० श्री रूपचन्दजी जैसे सिद्धान्ती विद्वान को यह टीका अक्षरश मान्य थी यह भी इससे सिद्ध होता है ! यह तो मैं पूर्वेमे ही लिख आया हैँ कि यह टीका हूंढारी भाषामे लिखी गई है । सर्वप्रथम मूलरूपमे इसके प्रचारित करनेका श्र॑य श्रीमान्‌ सेठ नेमचन्द बालचन्द जी वकील उसमानावादवालो को है । यह वीर स० २४५७ मे स्व्र० श्रीमान्‌ ब्र० शीतलप्रसादजी के श्राग्रहसे प्रकाशित हुईं थी । प्रकाशक श्री मुलचन्द किशनदासजी कापडिया ( दि० जैच पुस्तकालय ) सूरत हैं। श्रीमान्‌ नेमचन्दजी वकी लसे मेरा निकटका सम्बन्ध था । वे उदाराशय और विद्याव्यासगी विचारक वकील थे। अध्यात्म मे तो उनका प्रवेश था ही, कर्मशास्त्रका भी उन्हे अ्रच्छा ज्ञान था। उनकी यह सेवा सराहनीय है । मेरा विश्वास है कि बहुजन प्रचारित हिन्दीमे इसका अनुवाद हो जानेके कारण श्रध्यात्म जैसे गृढतम तत्त्वके प्रचारमे यह टीका अ्रधिक सहायक होगी । विज्ञेषु किमधिकम्‌ । --फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्री




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