तीर्थङकर भगवान महावीर | Thirthkar Bhagwan Mahaveer

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Thirthkar Bhagwan Mahaveer by वीरेंद्र कुमार जैन - Virendra Kumar Jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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कुएड आम का नगर सोस्य-सा, 'चहल-पहल से भरत हुआ । दूर छूद्र कगडों से हे यह, सुभग शान्ति मे सना हुआ 0 त्याय मागे में निरठ नृपति भी, फ्रियत अनीति न करते हैं । समता के सुन्दर प्राड्रण म, सब स्वच्छन्द विचरते हैं ॥ नागर बुन्द प्राय सजन सब, जीवन सम्ल बिताते है। चे, दर, गुड, नमन, उन में कम आते हैं ॥ ' और उचा भी राज़ भवन मे, सुन्दर जीवन की लय है। सुलभ सभी सामग्री जिसमें, स्वयम्‌ मोंठ का आलय है ॥ अन्त.पुर मे त्रिशुला देवी, सुंख जीवन यापन करतीं। उनकी परिचियों में ठत्प, दासी हं अनेक रहतीं ॥ धीरे-वीरे ऋम-ऋम करके, समय सस्कता जाता है। जा भी चूण जाता है लेकिन, सौख्य-सृष्टि कर जाता है ॥ यों सम्राज्ली जिशुल माता, क्रेदिन सुख से , वीत रहे । प्रथण्ष ऋल आता जाता है, किन्तु न क्षोंद कष्ट सहे ॥ ये लक्षण तो बतलांते हैं, बत्स, असाधारण कोई। माँ त्रिशला के होने बाला, क्ष्या इसमें शद्धा कोई ॥ त्रिशला मु की टहल वजाती, हैं छप्पन कुमारियों सब । भौति भोति की चर्चा करके, वे प्रसक्ष करतीं हैं. सब ॥ इस चुन्नी के मुख्दर क्रम में, प्र्र तुद्धिः स्नाह्षी क्री। दिव्य भलक्तो हो रहती है, यह विशेषता है उनकी 0॥ >> ५९३ ्




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