अनुत्तर योगी तीर्थकर महावीर | Anuttar Yogi Teerthakar Mahavir

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Anuttar Yogi Teerthakar Mahavir  by वीरेंद्र कुमार जैन - Virendra Kumar Jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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५ ` ` अन्तिम क्षण तक जागतिक रेश्वयं मे चिद्विनास करते हए राजि भरतेश्वर, अन्तर्महनं मात्र मे, बिना तय क्लेश के ही केवनी हो गयं अर्हित । जीवन्मुक्त । किन्तु मरीचि का यात्रा-पय बहुत कुटिल या । भीतर निरन्तर परम- स रह कर, उमे म्वर्गो, नरको, पाशव तिर्यचो तक के भीतर मे आन्मान॒भव की यात्रा करनी थी । नारकी ओर पशु की यातना भौर अन्धता तक से वह गज़रा । क्योकि उसे पाणव-गक्ति प्रधान कनिकान का नीथंकर होना था । पशपतिनाथ होकर, मानवत्व को पणन्व मे उनार कर, देवन्व तक पहुंचाना था । उस षार अणशोकवन के क्रीडा-पवनं पर, उसे महसो देवागनामो के बीच नग्न विचरते देख रहा हूँ ।. कैसा निजन्व अनभव कर रहा हूँ । मेरे अपनत्व की प्रतिमा । फिर भी कितनी अनभ्य है मल्ले । चाहं नो अगन ही क्षण बहाँ हो सकता ह, अपनी इन्द्राणियो की बीच । वही मै । पर अशक्य, बीच मे देश और कान के दुर्नध्य ममद्र पड हुए है । क्योकि अभी इम क्षण मे मरीचि भी हें, केवन अच्य॒न स्वगे का इन्द्र ही नहीं । फिर ब्रह्म स्वर्ग ईणान स्वर्ग, मौघम म्बगे के मकरन्द-मरोवरो म स्नान- केनियां नन्द्रानस कन्य-ननाओ की छावो म आन्म-विस्मृत एन्द्िक सुखो कौ मूर्च्छा । फिर जाने कब वार्ड गहरा आघात जागृति स्वयबोघ माहेन्द्र स्वगं से च्युत होकर. पृथ्वी पर जगत्‌-प्रसिद्ध भारद्वाज. त्रिदण्ड मे सुशोभित तजोमान ब्रह्मापि । किन्नु अपणं जान के अभिमानमे फिर भटकन। ण्केन्दरियम्थावरसे रम निकाय वें जोव-जन्तुजो की असख्यात योनियों तक में भ्रमण । देख रहा हं, जान गहा हे यह सब नानाविध सुख-दुखो की अन्तहीन मवेदन-परम्परा । मूर्छा ओर जागृति कौ इम खना की कडियो को जोढ नही पाना हूं । मडलाकार चक्रायित चल-चित्रो की इस जीवन-लीला का एक ही नायक, नाना देग-कान नाना रूप, भाव, वेश में । प्राण का एक निर्बन्ध श्रवाह । मगध देण की राजगृही नगरीके राजा विश्वभूति का पुत्र विश्वनदी । पिता अचानक प्रव्रज्या ले निष्क्रमण कर गये । भाविक, भोला, मौन्दर्यानुरागी यवराज विश्वनन्दी, राज्य की ओर से उदामीन । अपने स्वप्न को पुष्य- कर डक उद्यान मे रच कर, उसी में अपनी युवरानियो के साथ कऋोडालीन रहता । जाना बिशाखभूति राज्यासीन थे उनके मूखें पुत्र विशाखनन्दी को विश्वनन्दी




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