नवरतनम् | Navratnam Panchtikabhi Samlankritam

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Navratnam Panchtikabhi Samlankritam by श्री वल्लभाचार्य - Shri Vallabhacharya

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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इस प्रसगका निगूढ़ आशय श्रीहरिरायचरणने भावश्रकाय बहुत सुन्दर जब्दामें व्यक्त किया है--“गोविन्द दूबेके मनम विश्रहता भई ताको अभिव्राय यह जो गोविन्द दूबे जीव तो द्ृररिकालीला सम्बन्धी और सेवाभावत्रा ह्वनकी करे सो मन छागे नाही न राजलीलामें दुढ़ता होई न व्रजलोलामें सो अनेत' साधनमें मत दोरे जो तीर्थ करू के व्रत कह कोई जप करू इत्यादि मन भटके सो श्रीआचर्यजी महात्रभु नवरत्त ग्रय लिखि पठाये-'तु चिन्ता मति करें चितकी उद्देगता है यह प्रमुलीला जानि--भोठाकुरमे ते मन और ठोर जाये सोउ भागवदिच्छा मानि-चिन्ता मति करियों जितनी बने तितनी सेवा करियों तब गोविन्द दूबकों मन स्थिर होगयो, जहां मन छौकिक बेदिक में जाई तो भगवदिच्छा माने. श्रीरतछोडजीमे मन बहोत जाई सो भगवदिच्छा माने उहाकी लौलामे मग्न रहे काहेते ? ज्ञास्त्र पुरान अनेक उपाई प्रभुमिलन के कहे हैं जीवको मिममात्र मार्ग दिखाये जो जहाको अधिकारी है वामे वाकी मन स्वत सिद्ध लागत है ताते जैसे मनुष्य गैल चलिवेवारेक/ दम गामके मारग वताव पर-तु जाशो जा गाम जानो होई सोई गाम जात है तंते ही कोई भगवदीय द्वारा कोई गुर द्वारा कोई ईइवर द्वारा जैधों अधितारी तैसो सग प्राय उही सा्मे भाव बाको दृढ़ होत है सो गोविन्द दूवेको श्रीरणछोडजीमे दृढ़ भाव भयो पुष्डिप्रवाहमयदि ग्रन्यम सार्गभेदका मिरूपण किया ही गया है सभी जीवोके मार्ग भ्िन-मिन्न है स्वथम्‌ पुष्टिमागममें भी भगवानूतर पास पहुचनेकी अनेक दिशा या सरणो है जिस दिशाम सहजतथा हम चल पाते हा उप्ती ओर हमारे चलतेका प्रथास्त निरायाम होता है अपने स्वभावके अनुएप सहजतया जिम मार्गपर हम चलठ सकते हूँ, उसे छाइकर अन्यान्ध फछोवों कामनाक वश या मिख्यां अनुकरणकों मनोवृत्तिसे, जब हम अपने स्वभावविपरीत पार्गे- पर चचना चाहते है ता उस आयासमे विन्तो उद्भव या ध्यग्रता से सनके। ग्रस्त हो जाना स्वाभाविक वात है. पुष्ठिपयके पथिक स्वयम्‌ अपने स्वरूपका या अपने कतंव्यके स्वरूपवा अधवा अपने मजनीस भगवानके स्वरूपता चिन्दत करें यह तो स्वभावित्र तथा आवश्यक ही है इस विन्ततका स्थान परन्तु अस्वामाविक चिन्ता लेने लग जाये तो वह श्रीमद्ाप्रमुको नही सुहाता है क्योकि विन्ताका मूल हमारी आस्था




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