गुरु नानक जीवनी युग एवं शिक्षाएं | Guru Nanak Jeevani Yog Evm Shikshaen

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
14.48 MB
कुल पष्ठ :
346
श्रेणी :
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लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)ः गुरु नानक देव एक भूमिका डा० राघफुप्तुन गुरु नानक देव का पंचम जन्म-शताव्दी समारोह मनाना हमारे लिए उचित ही है । उन्होंने श्रपने देवा के ही नहीं वरन् विश्व के घार्मिक जीवन पर भी शअसित प्रभाव भ्रंकित किया है । निश्चित भारतीय परम्परा के श्रचुसार नानक देव घर्मे का स्वरूप श्रनुभूति- जन्य मानते हैं । इस मत को स्वीकार करने वाले श्रानुष्ठानिक क्रियाओं को हेय तथा परिभाषाओं को श्रनावश्यक समभते हैं । नानक देव हिन्दू तथा मुसलमान के बीच के श्रन्तर को श्रन्तिम स्थिति नहीं मानते । वे इस भेद-भाव से इतर श्रात्मा के धर्म को प्रोत्साहन देते हैं जोकि सार्वलौकिक स्वभाव का तथ्य है । जब हम घार्मिक जीवन की गहराइयों में प्रवेश करते हैं तो हमारे सिद्धान्त वैशिष्ट्य-रहित हो जाते हैं श्रौर हम श्राध्यात्मिक जगत का श्रनुभव करने तथा परम इन्द्रियातीत देवाधिदेव में विदवास संजोने लगते हैं ईइवर एक है (१ श्रोंकार) उसका नाम पूर्ण सत्य है (सतिनाम ) वह स्वेस्व का ख्रष्टा है . (करता-पुरख) .. वह किसी का मीत नहीं न ही उसकी किसी से शत्रुता है (निरभउ निरवेर) [निर्भय निर्वेर ] उसका विम्ब कालातीत है (श्रकाल-सुरति) वह प्रजात नहीं श्रपना जनक वह स्वयं ही है (अजूनी से भं) [ श्रयोनि स्वयम्भु ] मनुष्य उसे केवल गुरु-कृपा से ही जान सकता है । (गुरु-परसादि) प्रभु का शबद पहचानने वाले सब लोग उसकी महानता का गान करते हैं केवल साक्षातु करने वाला ही उसके बड़प्पन को जान सकता है । कौन उसकी गुणावली की कल्पना कर सकता हैं श्रथवा उसे कोन व्याख्यायित करने में समये है द १. दि सेक्िंड राइटिंग श्रॉफ दि सिख्स (१३६०) पृ० र८ | कनिननण
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