सवित्तरी | Sawittari

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Sawittari by शैलेश भटियानी - Shailesh Bhatiyani

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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मीता चुपचाप पांव दत्रा रही थी ! जनादेन कहत्ता रहा, “उसी रात पिताजी ने तुम्दें बुला लेने को लिखा था और कहा था कि 'ैंटे, पत्नी के विना जीवन कितना अबूरा है, इसे आदमी तदणाई में नहीं जान सवता ।' उनका कहना या कि पतली अर्दाय है भऔर अपना झरीर यदि दूपित हो जाए, तब भो हमें घारण किए रहना होता है ।” “हो बया वो भी सुर दूषित समभते ये ?” भीता की आवाज हालांकि धीमी ही थी, लेकिन अपनी प्रश्तवाचकता में वह जुँसे सारे कमरे में चमगादड़ों के कुण्ड की तरह फैल नई 1 “वो, मीता, तुम्हें अपनी बेटी के ठुल्य ही समभते थे । दृषण से उनका मततब तुम्हारी जिए और अलगावे से था । मैंने नव कभी कहा कि “बाबूजी, जो औरत एक वेटे की मां बन धुकने के बाद भी साय नही रहना चाहती, उसका मोह त्याग देने में ही भलाई है ।' तो+जानती हो, बाबूणी मे बया जवाब दिया ? कहने लगे कि 'संसार में उससे वड़ा भाग्यहीन कोई नहीं, जिसे उसकी पत्ती त्पाग दे | कही कोई कमी तुप्र्मे है या तुम्हारे आचरण में शक्ति नहीं है ।' मृत्यु से पहले की रात, उन्होंने फिर तुम्हे याद किया था और मुझसे बहा कि 'पवरदार, जब तक मीता अपनी ओर से तलाक न मांगे, उसे यह भूलकर भी न लिखना कि तुम उस्ते छोड़,देता होंगे । हमेशा उसके लिए प्रतीक्षा में रहना | मैं अब विदा होने वाला हूं, मेरे भाग्य में उसका सुद्ष नहीं था। मेरे क्रिया-कर्म, तेरहयी वर्गरह से निवटते ही उसे ले आना - एक बार किसी भी तरह । फिर अपने आचरण से उसे वश में करना।” उनकी मान्यता यही थी कि पत्ली का संबंध सादे संबंधों से बड़ा है, वर्योंकिः एक यही नाता जन्म-जम्मान्तरों तक का शास्त्रों में माना गया है। वादूजी कहा करते थे कि पत्नी को त्यागने में मां को त्याग देने से बड़ा पातक है ॥“*“और भी कितनी बड़ी बात वो कहते थे, सुनना चाहोगी 7“ मीता का चेहरा उस अधिरे में उसे बिल्कुल अपने पाश्व तक आ गया लगा और वह अपने हाथों पर उठता हुआ-सा बोला, “वावूजी कहा करते थे कि पली यदि वेश्यावृत्ति करने लगे, तव भी वह त्याज्य नहीं है । उसके सवित्तरी / २३




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