गौम्मटसार | Gommatsar [jeevkand]

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Gommatsar [jeevkand] by खूबचन्द्र सिद्धांत शास्त्री - KhoobChandra Siddhant Shastri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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हू रायचन्द्रजेनशाखमालायात्र । अभी इतना संदेह ही हैं कि यदि पुराणतिलकके कथनकों प्रमाण माना जाय तो अत हक नकी प्रमाण क्‍यों न माना जाय ? यदि माना जाय तो किस तरह घटित क्रिया जाय ? इसतरह गा - चंद्र सि. चक्रवतीका समय एक तरहसे अमीतक हमचने संदिग्ध ही है । इसीलिये का का यहीं विराम देते है । इसरी वात यह भी है कि समयकी आचीनता या अवाचीनतासे प्रमाणता याअ माणताका निर्णय नहीं होता । प्रामाण्य या अप्रामाण्यके निर्णयका हेतु अथकर्ताका ग्रंथ होता है । इस ग्रेथके रचयिता साधारण विद्वान न थे। उनके रचित गोमट्टसार ब्रिलेकसार लब्बिसार आदि डउपल्थ्व ग्रंथ उनकी असाधारण विद्धत्ता ओर “ पिद्धातचकरत्र्ती ? इस पदवीको सार्थक सिद्ध कर रहें हैं। यर्यापि उपलब्ध अथोंपें गणितकी प्रच॒ुस्ता देखकर लांग यह विश्वास कर सकते है के श्री नेमिचत्र ससि. चक्रवर्ती गणितके ही अप्रतिम पिग्डित थे, परंतु इसमें को£ संदेह नहीं कि वे सर्वविषयममें पूर्ण निष्णात थे । ४०. ् हम ऊपर जो गोमइसार संस्कृत दीकाकी उत्थानिकाका डछेख दिया हे उसमें यह वात दिखाई गई हे कि इस अंथकी रचना श्रीमच्ामृण्डरायकरे प्रश्नके अनुसार हुई है । इस विषयमें ऐसा सुननेमे आता एक वार भरा नेमिच॑द्र सिद्दातचकवर्ती घवलादि महासिद्धांत ग्रयोमेंसे किस सिद्धांत-गंथक्ता स्वाध्याय ह.$] कर रहें थ। उस्ा समय गुरुका दुशन करनेकेलिये श्री चामण्डराय भी आये। शिष्यकों आता हुआ द्ख- कर श्रीनेमि्चद्र सि. चकवर्तीने स्वाध्याय करना चंदु कर दया । जच चामुण्डराय गुरुकों नमस्कार करवेपे वंठगयथे तब उनने पूछा कि गरों | आपने ऐसा क्यों किया ? तब सुरुन कही 1क आवकर्का इन प्द्वांत अंधेके सुननेंका आवेकार नहीं है । इसपर चामण्ड रायन कहा के हमकी इन ग्रंथांका अववोध किस तरह होसक्ता दें ? क्रपया कोई ऐसा उपाय निवालिये कि जससे हम भा इनका महाचालभव कर सकें। सुनते है कि इसापर आनोमंचद्र्‌ से. चकंवर्तीने सिद्दांत ग्ंथॉका सार लछक्र इस गोमइसार ग्रथकी सचना दृ1 है १ इस भ्रथका दूसरा नाम पंचसंग्रह भी है क्याक्र इसमे महाकम्प्राभ्नत्क सिंद्दांततत्रथी जीव स्थान झद्दत्रध वघरवचामी वेद्नाखंड वर्गणाखड इन पांच [विषयाका वर्णन है | मूलमथ प्राक्ृतम॑ लिखा गया हैं । यद्राष मृठ ठंखक श्रीयत नेंमिचद्र से चक्रत्रता हा हैं, तथापि कहीं २ पर कोइ २ गाथा मसापवचद्र जवियदवने भी लिखी ह । यह टीक़ामें दा गाथाआंका उत्थानंक्रा के देखनेसे मालम देता हू) माधवचद त्रविद्यदंच श्री नेमिचद्र सि चक्रचताक प्रधान शेष्यॉमेंंसे एक थे। मालम हाचा है के तोन वदाओंक अविपति होनेके कारण हा आपकी जअविय्देवका पद मिला होगा । ड्ससे पाठकाकों भी अठाज करलेना चाहिये के नोमचद से, चकवर्तीकी परद्डता कित्तनां असाधारण थी 1 इस गथराजऊे ऊपर अमीतक चार लकी लेखा गड्ढ 905 है | जिसमें सवसे पहले एक कर्माठक ब्वाति बनी ह उसके रचायता गंयकत्ताके अन्यतम शेष्य श्रीचामुण्डराय है । इसी टक्निके आधारपर एक संस्कृत थक बनी ह, जिसके निर्माता केशवर्णी है, ओर यह ऊीका भी इसी नामसे परासद्ध है | इसरी संस्कत टीका शक्रीमद्भपर्चंद्र सिद्ध॑तचकऋचरत की बनाई हुई ह जो कि संठप्रचाध॑ना नामसे प्रस्यात है। उप- युक्त ठोनों टीकाओके आधवास्से अमाइडद्टर टोइग्मछजीनें सम्पग्जानचंद्दिवय नामकी हिंद्दा टीका बनाई ह 1 डरे कंन<> दानेऊक सिवाय तीनों टीक्ाओंओ आवान्पर यह संक्षिप्त बाह्वोघिनी टीका लिखी ह1 मंदप्रदाविनीः समक्ष पूर्ण नहीं मिख्सकी उ्यॉल्य जहादक मिल सकी बहांतक तीनों ठीकाओंके अचरस जन आग करेधबदर्णा? तथा सम्पम्जानचॉद्रेका के आधारसे हां हमने इसको ष्व्ख़ह्‌।




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