रसरत्न समुच्चय | Rasratn Samuchchaya

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Rasratna Samuchya by गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास - Ganga Vishnu Shrikrishnadas

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(४) कर पडता है कि इस समय आयुवदोद्धारक संबन्ध्म जेसा निस्‍्सार प्रयत्न- हो रहा है उससे उसकी उपयोगिताका 'छेश भी लोगोके ध्यानमें नहीं आ सकता, अतः सुचारुरूपस सुदृढ प्रयत्न होनेकी आते श्ञीत्र आवश्यकता ह । सवे साधारणकी स्वश॒रीर- रक्षोपयोगी वेद्यक संबन्धी ज्ञान प्राप्त करनेके साधन ओर खियाकी अपने गर्भ व बालकका पालन-पीषण एवं गाहेस्थ्य जेंविनर्क उत्तम दकशामें लानेके लिये आवश्यक ज्ञान प्राप्त करनेकी सुविधा: ओंका प्रबन्ध सबसे प्रथम होना चाहिये। अथवा वेद्यकसंस्था- आयुवदिक पाठशाल्ाओंको स्थापित कर उनमे विद्यार्थयोकों अछु भवके साथ पूर्ण शिक्षा देनेका नियमबद्ध प्रबन्ध हो, आयुर्वेदीय। सब प्रकारकी ओषधोंका देश सर्वत्र प्रचुर प्ंचार -.होकर, राजा रंक सबकी समान रूपसे सुलभ इसके किये एक.. विशाल कार्यालय खोलकर उसमें उनके निर्माणका विराषट्र आयोजन कंशते हुए स्थान स्थानपर उक्त कार्यो्यकी शाखायें इस इँगसे. खोली जाय कि जिससे यत्र तत्र धार्मिक घनिकों, सभाओं और सेयु क्त-वाणिज्य-साभतियों ( कंपनियों ) की ओरसे जो अंग्रेजी डायटरोंकी अध्यक्षता औषधोंके दातव्य भौषधालय खोले जाते है थे विद्वान वद्योक वत्वावधानमें देशी ओषधों्क खोले जाय कि जिनसे / यस्य देशरय यो जन्तुस्तज् तस्योषध स्मृतस्‌ इस सिद्धान्तक अनुसार श्रकृंति विरुद्ध ओर पमरुद्ध अभक्ष्यः भक्षण और अपेय-पानरूप तामसी विदशी चिकित्साके क्षणिक ओर क्त्रिम स्वास्थ्यके दुष्परिणामसे देशी जनता सदाके लिये रोगी अंग्रजी ओपधोंका दास न बनकर सालिक धर्मोनुकूल देशी चिक़ेत्सासे यथाथ लाभ उठाते हुए सदाके लिये स्वस्थ वर्न औः दा हो देशका धार्मक और जार्थिक छाभभी हो । ( जन थम के जिसकी शल्ठ भित्ति “ अहिंसा परमो घसः. इस मधत पर हा ह छस्तके सनेक अम्ुवायी और शीश, आचार तथा




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