कबीरकसौटी | Kabirkasoti

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Kabirkasoti by गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास - Ganga Vishnu Shrikrishnadas

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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कर्बारकसोदी । (१५१पहुरा दिये फरूठ साल पहुराना सूठगये ॥ सोचतेथे कि अगर सुकुट उतारकर पहरावें - तो दुबारा ख्रान कराना पड़ेगा ॥ इसी सोचमें गड़गाप हो रहे थे इतनेमें कबीरजीने डचोटीक़े वाइरसे आवाज देकरकदा ॥ किदेस्वार्माजीघुंडी खसोछकर पहुरादोतव स्वादीजीने जाना कियशतोपणेत्रह्म दे जो अंतगंतकी तब जानताहे ॥ डयोढी परदा दूर करके आसन दिया और अंकमाल किया ॥ स्वपी घुंडीखोछके तब मारा गठडार । गररबदास इस सजनकोजानतदे कर- : तार ॥ ड्योडीपरदा दूरकर लावा अंगढ्याय ॥ गरीबदास गुजरी वहुत बढ़ने बदुनामिछाय ॥ मनकीएजा तुमल्खीं सुकुट माउपरवड् ॥ गरावदास गातका छख कान नरन कोन मेज ॥आये कथा स्वाजीत पंडितकी बहुत हें मगर थोडासा . प्रहंग डिडाहे ॥ सवाजीत जब अपनी माके उपदेश दाशीजीमें आये तो उतकेसाथपुस्तक बेलॉपर ठदेहुयेये ।नीरु: जोठाहाकी ठडकी कुवेपर जठ सर रदीयी ॥ पंडितजीन उससे पूछा कि कबीरका परकहां हें उडकीने नवाव दिया कवीरका पर शिखर है जहांसठेहली गेठ पांव न टिद्दे पिपीछिका पंडितलादेवेला। पंडितने जाना कि यह ठड़की जरूर कबीरको जानती होगी ॥ उसने एक पानीका छोटा भरकर उस लड़कीके पास दिया




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