सध्दर्म मण्डनम् | Sadhmarmandam

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Sadhmarmandam by हुक्मीचंद जी -Hukmichand Ji

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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रे [२ ] अर्थात जगतके सम्पु्ण जीबोंकी रक्षा रूप दयाके छिये भगवानने प्रवचन कक्ष है। इस मूलपाठमें जीव'क्षा रूप धर्मके लिये जेनागमकी रचना होना बतछायी गई है। अत: जीवरक्षा रूप धम जोन धममका प्रधान अड्ज है। उस जीवरक्षाकों जो धर्म मानदा है और विधिवत्‌ उसका पाढन करता दे वही तीर्थद्वरकी आज्ञाका आराघक पुरुष है। इसके . विपगीत जो जीवरक्षाकों धर्म नहीं मानता किन्तु इसको पाप भथवा भ्रथम बताता है. वह घमका द्रोही ब्ले” वीतरागकी जआाज्ञाका ठिरस्कार करने वाल है । । केवल झोनधम ही जीवरक्षाको प्रधान धम नहीं बतलाता किन्तु दुसरे मतवाल़े शास्त्र भी इसे सर्वोत्तम भोर सवप्रधान धम मानते हैं। महाभारत शान्तिपवर्मे छिखा है छि-“प्राणिनां ग्क्ष्ण युक्त सत्युभीवादि जन्तवः मरात्मोपस्येन जानद्धिरिष्टं स्ेस्य जीवित “दीयते मार्य्यमाणस्य कोर्टि जीवितमेव वा। धनकोर्टि परित्यज्य जीवों जीवतु मिच्छति! । जीवानां रक्षणं श्रेष्ठ जीव: जीवित कांक्षिण | तस्मात्समस्तदानेस्योउभयद ने प्रशस्यते | हु एफत: काध्वनों मेरुवेहुरत्ना वहुन्धरा .. या ... एकतो भय भीठस्य प्राणिनः प्राणरक्षणप” अर्थात जैसे अपना जीवन इृष्ट है उसी तरह सभी प्राणियोंका अपना अपना झीवन इष्ट है, सभी जीव मरनेत्ते डरते हे इसलिये सभीकों अपने समान ज्ञान कर उनकी प्राणरक्षा करनी चाहिये । ; मारे जाने वाढे पुरुषक्ो एक तरफ करोड़ों घन दिया जाय झोर दूसरी भोर उस्तका झीवन दिया ज्ञाय तो वह घन छोड़ कर भीवनकी ही इच्छा कर्ता है। जीव रक्षा करना सबसे प्रधान धर्म है। सभी जोव जीवित रहना चाहते हैं । इंघडिये सभी द्‌ नोंमें अभयदान यानो जींवरक्षा काना श्रेष्ठ है। दे एक तरक सोनेका पन्त मेरु ओर वहु/ल्ा पृथवी रख दी जाय ओर दूसरे तरफ मत्युभीत पुरुषका प्राणाक्षण रूप घ्म .*ख दियाजाय तो प्राणरक्षा रूप घमद्दी श्रेष्ठ ः सिद्धहंगा। . ल्‍ल इसी प्रकार-विष्ण पुगणमें भी छिखा है-- ४. #कपिछानां सहस्ताणि योहिजेस्य; प्रयचछंति - एकस्य जीवित दुयानतच तुल्य॑ युधिष्ठिए! -




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