दक्ष - सुता | Daksha - Suta

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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डाल-डाल पर कलियां चटर्खी- नव सौरभ लहयया,पुष्पावलियों पर अनजाने- भरें का दल आया,कोयल कूक उठी, अवनी की- विहँंस उठी अमराई,लता विटप से लगी लिपटने- रस बेबस सरसाई,कुण्ज-कुण्ज में हवा हठीली- मादकता फैलाती,उघर रही डाली को बूतन- किशुक चीर पिन्हाती,सरसों के खिलते फूलों पर- तितली-दल मेंड़राते,कली-कली को मधुप मनोहर- ग्रुन-गुन गीत खुनाते,अमरलोक-सा दक्ष-नगर था- मोहक रस से गीला,यहाँ उषा थी शीतल लहरी- चंदा सदा पनीला,दक्ष-सुता 13




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