श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम् | Shri Madwalmiki Ramayan Uttrardh Iii

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Shri Madwalmiki Ramayan Uttrardh Iii by द्वारका प्रसाद - Dwarka Prasad

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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चतु.पद्बाश: सगे: भ्घे७ पित्रा नियुक्ता भगवन्‌ प्रवेक्यामस्तपोवनम्‌ । धर्ममेव चरिष्यामस्तत्र मूलफलाशनाः ॥१६॥ है भगवबन्‌ ! हम लोग पिता के आदेशानुसार तपोवन सें प्रवेश करेंगे और वहाँ फलमूल खा कर, धर्मांचरण करे गे ॥१६ ॥ तस्य तह चन॑ श्रत्वा राजपुत्रस्य धीमतः उपानयत धर्मात्मा गामध्य मुदुक ततः ॥१७॥ धर्माप्मा भरद्वाज ने धीसान्‌ राजकुमार श्रोरामचन्द्र जी के ऐसे बचन सुन कर, उनको मधुपक, अध्य - ओर चरण धोने को जल रखा ॥ १७॥ [ टिप्पणी श्रीरामचन्द्र जी को राजकुमार का विशेषण आदि कवि ने इसलिए, दिशा है कि, मरद्वाज ने उनको मघुपर्क दिआ था | मघुपक देते का विधान स्मृत्यनुसार राजा को भी है। यथा-- गो मधुपर्काहों वेदाय्याप्याचार्य ऋत्विक्‌ स्नातको राना वा घमयुक्त इति ] नानाविधान*चरसान्‌ वन्यमूलफलाभ्रयान्‌ । तेस्ये। ददो तप्ततपा वास चैयान्चकल्पयत्‌& ॥१८॥ नाना प्रकार के वन के कन्द्मूल, फल अन्न तथा रसीले पदार्थ उनके भोजन के लिए दिए ओर टिकने के लिए स्थान चतलोया । ( रसीले पदाथ से अभिप्राय शरबत से जान पढ़ता है )॥ १८ ॥ मुगपत्तिसिरासीनो सुनिश्चिथ॒ समन्‍्ततः । राममागतमस्यच्य स्वागतेनाह त' झुनिः ॥१5॥ १ उपानयत--रामसमीर्ष प्राययत्त । (शि० ) २ अन्नरसान्‌ू--रस प्रधानान्पदार्थविशेषानित्यर्य .। (गो ०) # पाठान्तरे---चेवाम्यकल्पयत्‌ ।”




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