विद्वद्रत्न माला भाग - 1 | Vidwadratnamala Bhag - 1

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Vidwadratnamala Bhag - 1   by नाथूराम प्रेमी - Nathuram Premi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( १७ ) यहांपर एक वात यह विचारणीय है कि वीरसेनस्वार्मके पीछे जिनसेन और जिनसेनके पीछे गुणमद्रस्वामीने ही आचार्यपदको सुशोमित किया था, या अन्य किस्तने। देवसेनसूरिने अपने दशेनसा- रगन्थम काष्ठासंघकी उत्पत्तिम लिखा है किः--- 'सिरिवीरसेणसीसो जिणसेणो सयरूसत्याविण्णाणी | सिरिपउमणंदि पच्छा चडसंघसमुदुरणघीरों ॥ ३१ ॥ तस्य य सिस्सो गुणवं गुणभद्दो दिव्वणाणपरिषुण्णों । पक्खोबासमंडिय महातवों भावलिंगो य॥ ३२ ॥ तेण पुणोत्रि य मिच्च॑ णेऊंण मुणिस्स विणयसेणस्स | सिद्धंतं घोसित्ता सय॑ गय॑ सग्गलोयस्स ॥ ३३॥ अर्थात्‌--श्रीवीरसेनाचार्यके शिष्य जिनसेन जो कि संपूर्ण शान्नाके ज्ञाता थे, श्रीपअनन्दिके पश्चात्‌ चारों संवके स्वामी ( आचाय ) हुए | फिर उनके शिप्य गुणवान्‌ गुणभद्र हुए जो कि दिव्यज्ञानसे परिपर्ण, एक एक पक्षका ( १५ दिनका ) उपवास करनेवाले, बड़े मारी तपस्वी, और सच्चा मुर्निर्ठिंग धारण करनेवाले थे । उन्होंने श्रीविन- कली >४ा १. संल्कृतछाया-- श्रीवीरसेनशिप्यों जिनसनः सकलशासत्रविज्ञानी श्रीपझनन्दिपज्यात चतुःसंघससुद्धरणधीरः ॥ ४१ ॥ तस्य च शिप्यो गणवान ग़णमद्धो दिव्यकज्ञानपरिप्णः ! पक्षोपवासमण्डितः महातपः सावलिद्वक्ष ॥ रे३॥ तेन पुनोपि च मृत्यु नीत्वा सनः वविनयसनस्य । सिद्धान्त घासित्वा स्वयं गते स्वगलोकस्य ॥ ४१ ॥ डर




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