राजा राममोहनराय से गांधीजी | Raja Ram Mohanaray Se Gandhi Ji

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
3 MB
कुल पष्ठ :
182
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)डे
१८५७ का युग
१राजा राममाहनराय १८३८ में अग्लटमें गजर गय। भारतके लोक
जावन7 प्रगतिक सम्बपर्में अुन्हान दा मख्य माय स्थापित क्यि१ सस्झत फारसा और अरबी द्वारा प्राप्त विद्याथनक॑ बटावा
अग्रता भाषा साखकर अुसत द्वारा भिग्ठडक़ा नयी विद्यार्से हस्तगत वी जाय२ जन जीवनमें जागति और नवचतनका संचार करनत एिज प्राचीन
अबर्वरबादकी बुनियाट पर नया धम विचार पुन स्थापित क्या जाय
और भुमर्र आधार पर भारतीय समाज जीवनरमें पुतरातान और सुधारवा
काम वारी कया जाय। सतीप्रथाका विराध विधवा विवाह कयाविशा
आहटि बातें जिसाका परिणाम था।परन्तु भारतका घम-सस्झृतिके मामले व स्वस्थ और स्वधमनिष्ठ
रहू। जिसतिअ आसाना धम-परिवतनका प्रवत्तिका अन्हान पसन्द नहां
किया और भारतके छाकाचारमें अुस टगवा मुधारका अवहरना का।जिस प्रवार राजा राममोहनरायने भारतमें नवयुगका आरभे क्या।अग्रज शासक अजथात् मकॉोले वटिक आहि टायर अपराकत वस्तुजाको
पसट बरत ये। परतु जतका भूमिका ओर टप्टि टूसरा था। राममादनराय
दणका सत्त्वनिष्ठ प्रगतित्री दृष्टिस साचत थ अप्रज अपन रायत़ा भ्रतिप्ठा
और पिरतावी दृष्टिस और अपना सम्दृतिका शुत्तमताका दृष्टिस विचार
करत थ॥ वे धम-यरिवतनकी प्रवत्तिका अप्ट मानत थ और भारतमें
पतिचिमा ”गस समाज-परिवतन भी हाता रह तथा जमा मक्नॉरिन अपन जक
गाय धान अचानमें कटा था भारताय टाग जग्रता भौर जुनझ्ा सस्दृतिक
पूजझ तौर अनुसरण करनवार बनें जिस व वाठनाय यल्नु मानत थाराजा काटस्यथ कारपमू व अनसार अग्रजाका जिस प्रवारया असरहान ना शगा था। और जिसमें काज्ा जाचय नहा। परन्तु राजा राम
माहनायती दृष्टि जिस प्रशारक परिववनक्र विस्द्ध था व्याक्रि भारतश्३े
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