महाभारत का कर्णपर्व्व | The Mahabharat Karanparva

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The Mahabharat Karanparva by वेदव्यास - Vedvyas

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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4422-34. २६० ००००० न सनसनी 38240: य3 ८८ आप नल २०८३३ प नर 9न5० ६९०९ ) कर्मपव मी ख्दा रीक7९ 7... [6909 3०००० ०-+> सु ल+_>->स9+9+9५+9>२+> ०२०३ ७ा+«+ २० नतञ०+8>क9+>>2»»+1७+31«०26० 5०० नशा ० तन कमा तह: भषइते यर्ण तमुझे छोमदर्षणम्‌। कुरूण) पाण्डवानाश्य परस्परजयोषिणाम # १४ ॥ ततोदिदिष्स श॒र्द्धं कुरुपाण्डंबसनयाः । कणे सनापतो राजद ध्ूवांतीय दाद णाम ॥१५॥ ततः शबहुझ्षये ऋरवा समदान्त रणे इषः | पश्यता घाक्तराष्ट्राणां फाल्युनेन निषावितः ॥ १६॥ ततस्तु सम्जयः सर्वे गरवा मायपुर प्रति | आचष्ट प्लतराष्ट्राय यहवृत्त कुरज्ाइले ॥ १७ ४ जनसेऊय उचाच । भापपरेय ते श्रत्वा द्रोणजश्ञाप महार थम | जगाम परमामात्ति बुद्धो राजाम्विफासतः ॥ १८ ॥ सत श्त्वा तिह्त कर्ण दुर्य्यों घनगडितेपिणम । कथे झ्विजवर आणतधारपत्‌ दु/छितः ॥ १९ ॥ यह्मिर जयाशां पुत्रा पांसममस्पत पार्षिष: | तस्मिन इते स फोरब्यः कर्य भाणनघारयत्‌ ॥ २० ॥ पुर तब मम्ये5६ नणा कुजड्पि यत्तताम। .यत्र कर्ण हृते खत्दा सात्यजस्जीवित भुपा ॥ २९ # सथा शास्तनर्थ यूद्ध ब्रहमनू बाहलीफमेम स्व द्रोणप्च सोमद चभय भूरिधव समव य ॥ २२ ५ तथेव घान्यातव सटध्दद। पुश्ना| पाजांश्य ने मनन नमन पन्ना नमन मम ज परस्पर में विजयामिलापै कौरय और पाणटवोका महा रोमहर्पण युद्ध भारम्भ हुआ, १४ | है राजा कण के सेनापातिहोने से उस कौरवी और और पायडेवी सेना ओंका[,देखने के योग्य दो दिनतक्क अपूर्य युद्धहआ । १५ । इसकेपीछ हजारों शत्रुओंको मारकर कण छतराष्ट्र के पुत्रेके देखतेही देखते भजुन क शापसे मारागया । १६ | फिर शीमदी दस्तिनापुर जाकर यह सबृहृताम्त छोगोन शत राष्ट्र से कहा पह एत्तान्द झुछु जांगल देशों में मासेद्ध हुआओ। १७ णन्‍्मेशय बोले कि भीष्य और महारथी द्रोणाचार्यजी कोमी एृतकहुमा सुनकर अंविकाके पुत्र हद्ध राजापृतराष्डन बड़ा सदकिया। १८। है ब्राह्मण फिर उप्र दुःखी इंतराष्टू दुष्पोंदम के हितकारी कण कोभी मराहुभा सुनकर कैसे अपने प्राणों को भारण किपा। १९। जिसने के भपने पुत्रों के विजयकी इसी कर्ण में भाशा मिश्यव करके फररसी थी ऐसे कर के मरने पर इस कौरव ने अपने 'कंसे जीबन को रबखा + २० । ऐसे स्थानमें कर्शकों पदक सुनकर जो राजाने भ्रपने ब्राणोका स्पाग नहीं किया इससे में निश्चय जानताह कि दुःख वत्तमान मतुप्प वही कठिनतासे मरताई | २१ । है राजा 'इसीमकार हृद्धभोष्य ,वाहुटीक ट्रोणायायें सोमदत जार भूरिथवा को । २९५ | ओर अम्प मित्रों समेत गिरा एछू0पा3२६७ 0पढ्री1६ & णाते०्तिं 81 छाती दी एकल्‍1तै॥४58 07 +एज० 0855५ 15, पल ॥हणांप्रद्ट शैढंव पीएड्ययतें4 061009, ऐंदामा जाछ होगाए 59 सैद्युप्रत दा ऐ1७ 97030900 0 (16 8005 ० की।संक्जी 8, विदा, 6 ए60.1७ कशाईं 10, ७8 0गंहएपफ 800. 10 ह60छ3 डज़ाहएते ध्राए0च्रु0०४0 006७ ण्शधए तंडत्रणगुं458 8थाव, ५ ल ७5८च१ ० ४0० पैडढ0॥ रण छाभाण ॥णव 709, 1110 18१0076 १8३ एप) ते/००४३१; 0 ७०पॉपे 86 हप्रडक्षय गीं3 [16 00 #ल्बसणट ० शा० ठेरबएी री एबहदा (6 ठेडमीतड ०6 फोवरएण्वेपदार उु०छ ००पोपे 6 1श्ञ2ए० ५० 1108 09 प्रछछयंप्रडठ ० पा तर्क ० फिक्षका ०० आरात्रा _ तेटलातेस्ते प्र प्रणव ण शातपगढ़ ६० पड बणाडी. 7 एजे2४० पाक छाढ0 8 ०वएुएॉ० कपीलियाड 8705६ श्पेधाएन. 81, 8फ्रोग्रोज, गे 8019॥9 १७५)॥;, प +ए नल मन टजनन न नल न नल नजर पक रन नल नमन मत 2 मत तज >> तनमन




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