महाभारत | Mahabharat

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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चौथा अध्याय € राजा मिथ्याभाषियों से अ्रप्रसन्न रहते हैं और झूठे मंत्रियों का तिरस्कार करते हैं। राजमहक्ष में रहने वाले के रनिवास की श्षियों और उन लोगों से जिनसे राजा हेप रखते हों या अग्रसत्त रहते हों मित्रता न करनी चाहिये। छोटे छोटे कार्यो का करते समय मी राजा षा उनकी सूचना देने से हानि की सम्भावना नहीं रहती । राजा के सामने बिना उनकी आज्ञा के न तो बोलना चाहिये और न बैठवा ही चाहिये। मर्यादा के भज् करने पर पुत्र पौच्र तथा भाई झादि स्नेहियों तक का शत्रुदूमन करने वाले राजा अउमान करते हैं | संसार में राजा की सेवा यत्नपूर्वक वैसे ही करनी चाहिये; जैसे मनुष्य देवता तथा अग्वि की करते हैं । जे। लोग कपटपूर्वक राजा की सेवा करते हैं उनका नाश राजा शीघ्र कर डालता है। राजा जिस समय कुछ पूँछे अथवा आज्ञा दे, तो उसे उसी समय बिदा घमरड या क्रोध के पालन करना चाहिये। प्रत्येक बात का समर्थन करते समय द्वितकर और प्रिय बात कहे । हिदकर चचन के सिवाय हानिकारक प्रिय वचन कभी न कहने चाहिये । सत्र विषयों और बातों में राजा के अनुकूल ही कहना चाहिये किन्तु ऐसी प्रिय बात भी न कहे जे। सुनने में ते। अच्छी हो किन्तु वास्तव मँ हानिकारक दो । यह जानते इए भी कि, में राजा का पापान्न ह चतुर मलुप्य को कोई काम सावधानी से न करना चाहिये, किन्तु हमेशा राजा को अ्रच्छे लगने बाले काम सावधानी के साथ करने चाहिये । राजा के हानि पहुँचाने वाली बातों में जे नहीं पड़ते और जे। राजा के शत्रुओं से अलग रहते हैं तथा राजा के आज्ञाजुसार ही काम करते हैं; वे ही लोग राजभवन में रह सकते हैं। घुद्धिमान्‌ मनुष्य के राजा के दाहिने था बाएँ बैठना चाहिये और शखधारी अज्ञरक्षकों का राजा के पीछे बैठना चाहिये | राजा के सामने बड़े आसन पर बैठना अजुचित है और अपने सामने राजसभा में यदि कोई गुप्त वार्तालाप हो तो उसे वाहर प्रकट करना भी अनुचित है । ऐसा करने से ते दरिद्र वक का अपमान होता है ते राजा की क्या गिनती है और राजा की कही हुईं कड़ी बात भी बाहर न प्रक करना चाहिये । कूढ बोले




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